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तभी मनुष्य जन्म लेने का अर्थ पूरा हो सकता हैः दाती जी महाराज

Mon, 18 Mar 2013 10:16 AM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
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जिस अविनाशी परमसत्ता के संकल्प से अखिल ब्रह्माण्ड का अणु-अणु थिरक रहा है और प्रत्येक प्राणी में जीवनी शक्ति का संचार भी हो रहा है। वह कौन है, कैसा है- ठीक- ठाक कहा नहीं जा सकता है। वह अगोचर और मन-वाणी से परे मात्र निज अनुभव से ही जाना जा सकता है। यही वजह है कि श्रुतियों में” कस्मे देवाय हविषा विधेम। “यानी उस कौन देव की पूजा-अर्चना कर आहुति देने आदि की चर्चा बड़े विस्तार से की गयी है। वह अविनाशी सत्ता वास्तव में अकथ, अनादि और अपरिभाषेय है। वह एक ऐसी अविनाशी सत्ता है जिसे सत्, चित व आनंदमय भी कहा गया है, वही जगत, जीव व ब्रह्म के स्वरुप में प्रत्येक जड़-चेतन में सदा सर्वत्र प्रकाशित हो रहा है।
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उस सच्चिदानंद परमात्मा का ही सत् रुप जगत के प्रत्येक अणु-परमाणु में विचरण कर रहा है। उसी का चित् रुप हर प्राणी के अंदर चेतना का संचार कर रहा है और उसी का आनंद स्वरुप घट-घट में रमकर राम बन गया है। वह सबको आकर्षित करने के गुणों से युक्त होने के कारण कृष्ण और सर्वव्यापकता आदि गुणों से युक्त होकर विष्णु नाम धारण कर नार अर्थात जल में अपना अयन बनाने वाला नारायण बन बैठा है।

उसे ही ओम्, तत्, सत् आदि के द्वारा इंगित किया गया है। किंतु यहां एक बात स्पष्ट रुप से समझ लेने की जरुरत है कि वह परम अविनाशी सत्ता मानव शरीर में ही अपनी पूरी क्षमता और प्रभुसत्ता से इस प्रकार से विराजमान है कि यदि जीव चाहे तो वह इस शरीर के माध्यम से उस परम सत्ता का उसकी पूर्णता के साथ अनुभव कर सकता है।
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ऐसा करने में कोई अन्य प्राणी सक्षम नहीं है। क्योंकि उस परम सत्ता ने मनुष्य का निर्माण ही इस तरीके से किया है कि इस शरीर में ऐसी साधना व कर्म किया जा सकता है जिसके फलस्वरुप मनुष्य को उस परमसत्ता के परमानंद व सच्चिदानंद स्वरुप का उसकी पूर्णता व समग्रता के साथ परिचय व सानिध्य लाभ मिल सकता है।

मनुष्य को उसका प्रत्यक्ष अनुभव व साक्षात्कार बड़ी आसानी से हो सकता है। क्योंकि बनाने वाले ब्रह्म ने मनुष्य को अपने स्वरुप में गढ़कर ब्रह्मांड के ही छोटे सांचे में ढाला है। इन तथ्य को अनुभवी संतो ने अपने अनुभव के तराजू पर तौला है और श्रुतियों की इस घोषणा से सहमति व्यक्त की है कि सर्व खल्वमिदं ब्रह्म यानी अखिल ब्रह्मांड में जो कुछ भी है वह सब उस एकमेव अविनाशी सत्ता की ही अभिव्यक्ति की विविध शैलियां व मुद्राएं हैं। उसे तत्व से जानकर ही मनुष्य जीवन सार्थक होता है।

साभारः परमहंस दाती जी महाराज
दाती जी महाराज परिचय
दाती जी महाराज का जन्म 10 जुलाई 1950 को राजस्थान के पाली जिला में अलावास गांव में हुआ। दाती जी महाराज बचपन से ही तीक्ष्ण बुद्घि के स्वामी थे। बाल्यकाल में ही इनका लगाव ईश्वर से हो गया था। इन्होंने संसार में व्याप्त ज्योतिष, ध्यान और शनि संबंधित भ्रांतियों को दूर करने का विचार किया। इनकी विद्या, ज्ञान और कृपा से बहुत से भक्त लाभ प्राप्त कर रहे हैं। दाती जी के तीन प्रमुख सिद्घांत हैं सेवा, सतसंग और सुमिरन।
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