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आहार, निद्रा और मैथुन पर नियंत्रण के लिए जरूरी योगः गुरू मां आनंदमूर्ति

Wed, 19 Jun 2013 11:43 AM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
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हठयोग के अनुसार योगासन करने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि उनका हमारे मूलाधर, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, अनाहत, विशु (आज्ञा और सहस्रसार इन चक्रों, शक्ति-स्थानों) पर सीधा प्रभाव पड़ता है। इन चक्रों के जागरण में योगासन अत्यंत सहायक होते हैं। आसन करते हुए जब आप श्वास की लय (क्रिया करते हैं, तब इड़ा और पिंगला नाड़ियों में संतुलन निर्मित होता है और सुषुम्ना नाड़ी को सक्रिय करने में मदद मिलती है।
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लगता तो ऐसा है कि कर तो हम आसन रहे हैं, पर असल में यह इन चक्रों और कुण्डलिनी के जागरण की पूर्व तैयारी हो रही होती है। अगर मूलाधर और स्वाधिष्ठान चक्र जागृत नहीं हुए हों, तो व्यक्ति भौतिक और लैंगिक वासनाओं से छूट नहीं पाता, चाहे वह आध्यात्मिक प्रवचनों में से जितना मरज़ी शाब्दिक ज्ञान इकट्ठा कर ले। मूलाधर चक्र मानसिक और शारीरिक स्तर पर सभी उत्सर्जक प्रणालियों जैसे जननेंद्रिय, उत्सर्जक इन्द्रिय इनका नियंत्रण करता है और सभी मौलिक और नैसर्गिक उत्तेजनाओं को संग्रहित करता है।

तुम्हारी सभी इच्छाएँ और वासनाएँ स्वाधिष्ठान चक्र के स्थान पर एकत्रित रहती हैं। यदि कोई व्यक्ति स्वार्थी या शीघ्रकोपी होता है, तो वह उसके स्वाधिष्ठान चक्र के कार्य अक्षम होने के कारण है। स्वाधिष्ठान चक्र की संरचना इतनी सूक्ष्म है कि उसको समझना किसी सामान्य स्तर वाली बुद्घि के पुरुष के बस की बात नहीं है।
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स्वाधिष्ठान चक्र हमारे संस्कारों जैसे मानसिक प्रभाव, चुनाव, निर्णय और क्रियाओं आदि को किस तरह नियंत्रित करता है, इसके बारे में हमारा चेतन मन बिलकुल ही अनभिज्ञ है। और तो और, तुम्हारे संगी-साथियों का चुनाव भी एक तरीके से स्वाधिष्ठान चक्र ही करता है।

फिलहाल तो वह कार्य अक्षम है और अभी तक जागृत नहीं हुआ है। स्वाधिष्ठान चक्र को सक्रिय किये बगै़र कोई भी अपने मन और शरीर पर नियंत्रण प्राप्त नहीं कर पाएगा। सत्संग में तुम यह संदेश सुनते रहते हो कि ‘वासना को त्यागो’, पर चूँकि तुम्हारा मूलाधर चक्र सोया है, तो यह बिलकुल स्वाभाविक ही है कि ऐसे अचेत मूलाधर द्वारा आहार, निद्रा और मैथुन इन तीनों मौलिक और प्राथमिक ज़रूरतों से संबंधित उत्तेजनाएँ उठती ही रहती हैं।

तुम्हारा उन पर कोई नियंत्रण नहीं रहता। स्वाधिष्ठान चक्र अगर जागृत नहीं है, तो सत्संगों में सुना-सुनाया तुम्हारा सारा ज्ञान मस्तिष्क के किसी एक कोने में इकट्ठा होकर पड़ा रहेगा, लेकिन वह तुम्हारे लिये अनुपलब्ध ही रहेगा। और तो और, अचानक उद्भूत हुए उच्च-रक्तदाब के परिणाम स्वरूप दिमाग़ की नस फट जाने से तुम उन सभी जानकारियों को और सारे ज्ञान को खो भी सकते हो।

कितने वेदांती संत अपने जीवन के आखि़री दिनों में बेहोश हुए पाये गये हैं- चार-छः महीनों तक उन्होंने पीड़ाएँ भोगी। वे याद ही नहीं कर पाए कि वह संत हैं या गुरु हैं या क्या हैं। उनकी सारी स्मृति, यहाँ तक कि अपनी पहचान भी चली गयी। पूरे जीवन भर उन्होंने वेदांत का अध्ययन-अध्यापन किया। शब्दों का ज्ञान मात्रा अनुचरों को इकट्ठा कर सकता है और इस तरह की व्याख्यानबाज़ी सम्पत्ति और प्रसिद्घि दे सकती है।

लेकिन रोग, पीड़ा और मृत्यु के समय यह शाब्दिक ज्ञान किसी काम नहीं आता। बिलकुल बेकार! शाब्दिक ज्ञान मस्तिष्क की कुछ कोशिकाओं में संग्रहित होकर पड़ा रह जाता है। मस्तिष्क में अगर रक्त की कोई नस फट जाए, तो वह कोशिकाएँ नष्ट हो जाती हैं और सारा ज्ञान निरर्थक हो जाता है। इसीलिये योग के अधिष्ठान के बिना यम, नियम, आसन, प्राणायाम इत्यादि के बिना पुस्तक का ज्ञान तो दो कौड़ी का है।
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