Chanakya Niti For Life
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श्लोक
त्यजेद्धर्मं दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।
त्यजेत्क्रोधमुखीं भार्यां निःस्नेहान्बान्धवांस्त्यजेत्।।
अर्थ: यदि किसी धर्म में दया का भाव नहीं है, तो वह केवल एक खोखला आडंबर बन जाता है—ऐसे धर्म को त्याग देना चाहिए। उसी प्रकार जो गुरु ज्ञानहीन हो, पत्नी सदैव क्रोधित रहे और जो बंधुजनों में स्नेह न हो, उन्हें भी त्याग देना चाहिए।
आचार्य चाणक्य के अनुसार आज जब समाज में दिखावे और आडंबर का बोलबाला है, यह श्लोक हमें बताता है कि असली मूल्य भावनाओं का है, आचरण का है। रिश्ते तब तक मूल्यवान हैं जब तक उनमें स्नेह, सहयोग और करुणा हो। यदि कोई रिश्ता केवल तनाव और क्रोध से भरा हो, तो वह आपके मानसिक स्वास्थ्य के लिए विषाक्त हो सकता है। ऐसे में बुद्धिमत्ता इसी में है कि व्यक्ति ऐसे संबंधों से दूरी बना ले जो जीवन को बोझ बना दें।
Chanakya Niti For Success
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श्लोक
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निर्घषणच्छेदनतापताडनैः।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा।।
अर्थ: जैसे सोने की परख उसे घिसने, काटने, तपाने और पीटने से होती है, वैसे ही मनुष्य की असली पहचान उसके त्याग, शील (चरित्र), गुण और कर्म से होती है।
आधुनिक युग में जहां व्यक्ति को उसके बाहरी लिबास और सोशल स्टेटस से आंका जाता है। आचार्य चाणक्य का यह श्लोक याद दिलाता है कि सच्ची पहचान परिस्थितियों में दिखती है। जब समय कठिन होता है, तब ही असली चरित्र सामने आता है। ये पंक्तियां आज के नेताओं, शिक्षकों, माता-पिता और हर आम इंसान के लिए मार्गदर्शन का काम करती हैं क्योंकि जीवन का मूल्य उसकी आंतरिक गुणवत्ता से होता है, ना कि उसकी चमक-धमक से।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।