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कथा सुनने और प्रसाद खाने से आखिर मिलता क्या है?

Tue, 16 Dec 2014 03:41 PM IST
श्रीराम शर्मा आचार्य/अध्यात्मिक गुरू
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देवता होने का अर्थ अपने आपको अच्छा बनाना और अपनी मनोभूमि को परिष्कृत करना है। मन में विचारणाएं ऊंचे किस्म की हों और शरीर हमारा ऊंचे किस्म के काम करे, इन दो गतिविधियों को आप योगाभ्यास, साधना आध्यात्मिक प्रयोजन कुछ भी कह सकते हैं। जो आदमी इस काम को कर लेता है, वह स्वयं सब प्रकार से शक्तिशाली हो जाता है।
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जो शक्तिशाली हो गया है, उसके लिए संभव है कि वह अपने को केवल अपनी उन्नति तक ही सीमित न रखे। मनुष्य के अंतरंग की उदारता, दया, करुणा आत्मीयता जब तक विकसित न हुई, तब तक आदमी अपने आपको कितना ही बड़ा बना ले अधूरा ही बना रहेगा। मनुष्य को अपने आपको निर्मल और उदात्त बनाना चाहिए। यही तो आध्यात्मिकता की राह पर चलने वाले दो कदम हैं।

कोई भी आदमी आध्यात्मिकता की राह पर चलना चाहता है, तो उसको दोनों ही कदम आगे बढ़ाना है। और कोई तरीका दुनिया में नहीं है। दिमाग में से कुछ वहम अब निकाल दिए जाने चाहिए। लोगों के दिमाग पर न जाने कितने वहम सवार हैं। पता नहीं कैसे वहम पैदा हो गए हैं कि भगवान का नाम लेने, माला जपने, उसका नाम बार-बार पुकारने और मंदिर के दर्शन करने, कथा सुनने और प्रसाद खाने से मनुष्य की आत्मा को शांति मिल सकती है।
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इस धारणा के पीछे कोई दम नहीं है। इतनी सच्चाई उसके भीतर है कि आदमी पूजा पाठ करे और भगवान का नाम ले। ताकि भगवान का काम हम याद करें, भगवान के कामों के लिए कदम बढ़ाएं। बस इतना ही पूजा-पाठ का मतलब है।

अगर हम पूजा-पाठ करते रहें और उसकी खुशामद करते रहें, मानते रहें कि माला घुमाने के बाद वह हमारे प्रयोजन पूरा कर देगा तो हमारा वह भगवान अलग है। यह उम्मीद पूरी नहीं होगी। भगवान के स्वरूप को हम इतना ही समझते और मानते हैं तो गलती करते हैं। उसके स्मरण और चिंतन भजन का इतना ही मतलब है कि भगवान जीव का कोई संबंध समझ आ सके।
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