फरहान की कहानी, जिसे अपने जीवन में सफल होने के सूत्र अपने पिता से मिले।
दिल्ली में एक आईटी कंपनी थी, कुटुम्ब। दो लोगों से शुरू हुई कंपनी दो हजार से भी ज्यादा लोगों की हो गई। इसकी वजह थे कंपनी के सीईओ फरहान। एक बार एक कर्मचारी ने फरहान से पूछा, आपकी कंपनी की सफलता का क्या राज है? फरहान बोले, मैं जब छोटा था, तो पिता जी से एक बार पूछा, क्या मैं बास्केटबॉल खेल सकता हूं? पिता बोले, यह तो तभी पता चलेगा, जब तुम खेलकर देखोगे।
थोड़ा बड़ा होने पर मैंने उनसे पूछा, क्या मैं अपना व्यवसाय कर सकता हूं? पिता बोले, यह तो तभी पता चलेगा, जब तुम व्यवसाय करके देखोगे। फिर मैंने एक दिन पिता जी से पूछा, सफल लोगों में ऐसी कौन-सी बात होती है, जो उन्हें सफल बनाती है? पिता बोले, सफल लोग निराले होते हैं। बस कुछ अलग पढ़ने, सोचने और करने का साहस रखो। मैंने पूछा, लेकिन मैं जिस क्षेत्र का जानकार नहीं हूं, उस क्षेत्र में कैसे अच्छा कर पाऊंगा? पिता बोले, जो लोग निराला सोचते हैं, वे अपनी सफलता के पैमाने खुद ही बनाते हैं।
जरूरी नहीं कि वे उस विषय के विशेषज्ञ ही हों। फेसबुक और गूगल से पहले किसी ने सोचा था क्या कि ऐसा भी कुछ हो सकता है। एक बार मैंने अपने पिता से पूछा, आपकी नजर में सफलता क्या है? पिता जी बोले, कई साल बाद जब तुम वापस अपने बीते समय को याद करो, और तुम्हारे चेहरे पर उसे याद करके मुस्कान आ जाए, बस वही सफलता है। सबसे बड़ी बात मैंने उनसे उनकी बीमारी के समय सीखी।
हम सारे भाई बहन उन्हें देखने के लिए अस्पताल में इकट्ठा हुए थे। उन्होंने सबकी तरफ देखा, और बोले, जीवन की अहमियत तभी समझ आती है, जब उसका अंत होने लगता है। सफलता से ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं रिश्ते, जो तुम्हें बना भी सकते हैं, और मिटा भी सकते हैं। उनकी अहमियत समझने में देर नहीं करनी चाहिए। फरहान बोला, मैं सफल हूं, क्योंकि मेरे रिश्तों ने हमेशा मुझे आगे बढ़ने में मदद की।