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दिन की शुरुआत इस तरह हो तो दिन बन जाएः आसाराम बापू

Mon, 20 May 2013 12:35 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
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हमारे मन की दो धाराएं हैं - एक है अभिमान और दूसरी है विनय। नासमझ होकर हमलोग धन का अभिमान कर लेते हैं, विद्या का अभिमान कर लेते हैं, सत्ता का अभिमान कर लेते हैं, सौंदर्य का अभिमान कर लेते हैं कि ‘हमारे जैसी सत्ता, सौंदर्य, विद्वत्ता, धन, परिवार किसी के पास नहीं।’
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अरे, ऐसे करोड़ों-करोड़ों संसार में आकर चले गये और उनको जहां से मिला है उस परमात्मा का सौंदर्य देखें, उस परमात्मा की सत्ता देखें और उस परमात्मा का परिवार- विश्व देखें तो फिर हमें अभिमान किस बात का आयेगा?

हम जब नासमझ होते हैं, विराट का सौंदर्य नहीं देख पाते हैं, विराट का ज्ञान नहीं समझ पाते हैं, विराट की सत्ता नहीं समझ पाते हैं, विराट का धन नहीं देख पाते हैं तब एक बूंद से बने हुए अपने शरीर में थोड़ा बाहर का उधारा ज्ञान पढ़-पढ़के, सुन-सुनके, सीख-सीखके ‘हमारे पास आ गया महाराज! हम विद्वान हो गये, हम सत्ताधीश हो गये, हम कुछ बन गये...’- ऐसा कहते हुए उस अखण्ड से हमारी अपनी एक खण्डित धारा बना लेते हैं।
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जैसे पिता से पुत्र अलग हो जाय तो कहीं अलग मकान ले सकता है, कहीं अलग कारखाना डाल सकता है लेकिन उस अखण्ड परमात्मा से अलग होकर जीव कहां कारखाना डालेगा? उस परमात्मा से अलग अभिमान करके हमलोग कहां विश्रांति पा सकते हैं? यह अभिमान कुछ-न-कुछ रूप लेकर चित्त को बहिर्मुख करता है और उस चित्त को अंतर्मुख किये बिना अखण्ड शांति, अखण्ड ज्ञान नहीं मिलता, अखण्ड सत्ता का अनुभव नहीं होता। अविचार से अभिमान टिकता है और विचार से विनय आ जाता है।

विद्या ददाति विनयम्।

अभिमान नासमझी से आता है। नासमझी हटाने के लिए प्रातः काल उठकर प्रार्थना करो: ‘हे भगवान! तू मान देनेवालों को प्रेरणा करके मुझे मान दिलाता है। हे परमात्मा! तू मेरा अहंकार मिटाने के लिए मेरा अपमान भी करवा देता है। तेरी बड़ी कृपा है। हजारों जन्मों से मैं चित्त की इस झंझटबाजी से कई माताओं के गर्भ में उलटा लटकता आया हूँ, कई पिताओं की गंदी इन्द्रियों से पसार होता आया हँ। हे परमात्मा! अब मुझे सद्बुद्धि दे।’

सुबह की हुई प्रार्थना बड़ा सामर्थ्य लाती है। सुबह किया हुआ संकल्प, शुभ भावना जल्दी सफल होती है। इससे आपके जीवन में विनय का सद्गुण बढ़ेगा, अहंकार दूर होगा और सत्संग का प्रकाश होगा।
तो अपने चित्त को प्रसाद से भरने के लिए सत्संग करें और सुबह-सुबह परमात्मा का संग करने के लिए परमात्मा की ही प्रार्थना करें: ‘हे भगवान! आज शुभ सत्संग देना।

हे परमात्मा! आज जीवन में विनय देना। आज के दिन शरीर का कोई-न-कोई सदुपयोग हो। इस देह का, मन का, धन का, बुद्धि का तेरी इस सृष्टि को सजाने में उपयोग हो जाय। तेरी सेवा करने में इनका उपयोग हो जाय और हम तुझमें, अपने ‘सोऽहम्’ स्वभाव में विश्रांति पाएं ऐसी तू कृपा करना।’

ऐसी यदि सुबह-सुबह आप प्रार्थना करेंगे तो महाराज! योगियों को गुफाओं में योग करने से जो मिलता है, तपस्वियों को घने जंगलों में तप करने से जो मिलता है, सतियों को सतीत्व संभालने से जो मिलता है वही आपको देने को परमात्मा तत्पर रहेंगे, उसके यहाँ कोई कमी नहीं।
साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आसारामजी आश्रम
संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।

गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं।
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