‘आत्मविश्वास’ यानी अपने-आप पर विश्वास। जीवन में सफलता पाने के लिए
आत्मविश्वास का होना अति आवश्यक है। आत्मविश्वास ही सभी सफलताओं की कुंजी है। जिस
व्यक्ति के जीवन में यह सद्गुण नहीं है वह बलवान होते हुए भी कायर सिद्ध होता है,
पढ़ा-लिखा होते हुए भी अनपढ़ सिद्ध होता है।
आत्मविश्वास की कमी होना, स्वयं
पुरुषार्थ न करके दूसरे के भरोसे अपना कार्य छोड़ना- यह अपने साथ अपनी आत्मिक
शक्तियों का अनादर करना है। ऐसा व्यक्ति जीवन में असफल रहता है। जो अपने को
दीन-हीन, अभागा न मानकर अजन्मा आत्मा, अमर चैतन्य मानता है, उसको दृढ़ विश्वास हो
जाता है कि ईश्वर व ईश्वरीय शक्तियों का पुंज उसके साथ है।
आत्मविश्वास
मनुष्य की बिखरी हुई शक्तियों को संगठित करके उसे दिशा प्रदान करता है। आत्मविश्वास
से मनुष्य की शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक शक्तियों का मात्र विकास ही नहीं होता
बल्कि ये सम्पूर्ण शक्तियां उसके इशारे पर नाचती हैं।
आत्मविश्वास सुदृढ़
करने के लिए प्रतिदिन शुभ संकल्प व शुभ कर्म करने चाहिए तथा सदैव अपने लक्ष्य पर
ध्यान केन्द्रित रखना चाहिए। जितनी ईमानदारी व लगन के साथ हम इस ओर अग्रसर होंगे,
उतनी ही शीघ्रता से आत्मविश्वास बढ़ेगा। फिर कैसी भी विकट परिस्थिति आने पर हम
डगमगायेंगे नहीं बल्कि धैर्यपूर्वक अपना मार्ग खोज लेंगे।
फिर भी यदि कोई
ऐसी परिस्थिति आ जाय जो हमें हमारे लक्ष्य से दूर ले जाने की कोशिश करे तो
परमात्म-चिंतन करके, ‘ॐ’ का दीर्घ उच्चारण करते हुए हमें ईश्वर की शरण चले जाना
चाहिए। इससे आत्मबल बढ़ेगा, खोया हुआ मनोबल फिर से जागृत होगा। सभी महान विभूतियों
एवं संत-महापुरुषों की सफलता व महानता का रहस्य आत्मविश्वास, आत्मबल, सदाचार में ही
निहित रहा है। उनके जीवन में चाहे कितनी भी प्रतिकूल व कठिन परिस्थितियां आयीं वे
घबराये नहीं, आत्मविश्वास व निर्भयता के साथ उनका सामना किया और महान हो
गये।
शिवाजी ने आत्मविश्वास के बल पर ही 16 वर्ष की उम्र में तोरणा का किला
जीत लिया था। पूज्यपाद लीलाशाहजी महाराज ने 20 वर्ष की उम्र में ही ईश्वर की
अनुभूति कर ली। महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर महाराज झुंड-के-झुंड विरोधियों के बीच
किशोर अवस्था से ही डटे रहे। दुबले-पतले महात्मा गांधी ने आत्मविश्वास के बल पर ही
कुटिल अंग्रेजों से लोहा लिया और ‘अंग्रेजो! भारत छोड़ो’ का नारा लगाकर अंग्रेज
शासकों को भारत छोड़के भागने पर मजबूर कर दिया।
अतः कैसी भी विषम परिस्थिति
आने पर घबरायें नहीं बल्कि आत्मविश्वास जगाकर आत्मबल, साहस, उद्यम, बुद्धि व धैर्य
पूर्वक उसका सामना करें और अपने लक्ष्य को पाने का संकल्प दृढ़ रखें।
लक्ष्य
न ओझल होने पाये, कदम मिलाकर चल।
सफलता तेरे चरण चूमेगी, आज नहीं तो कल॥
साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आशारामजी आश्रम
संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत
श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी
अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध
प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी
सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक
आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के
सेवाकार्यों में संलग्न हैं।
गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन
करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क
सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व
समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व
ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला
सिखाते हैं।