इंद्रियां हैं तो उनके संबंधित भोग भोगने की इच्छा होना बिलकुल स्वाभाविक है। सवाल यह उठता है कि क्या हम अपनी इंद्रियों की इन नैसर्गिक इच्छाओं को अपनी गुलामी का कारण बनाएंगे या हम इंद्रियों के गुलाम हुए बगैर अपनी प्राकृतिक जरूरतों की पूर्ति करेंगे। मन में उठने वाली इच्छाओं के जाल से मुक्त रहते हुए अपनी जरूरतों की पूर्ति करने में समझदारी है।
जब तक आप गहनता से इस विषय का चिंतन नहीं करेंगे, तक तक समय-समय पर दुख और सुख के कुठाराघात मन को घायल करते ही रहेंगे। तो इन आघातों से मन को बचाने के लिए अलग से कुछ समय निकाला करें, ताकि मन की वृत्तियों की धारा इंद्रियों के द्वारा बाहर न जाकर अंदर मुड़ सके। अर्थात जब आंखें बंद करो, तो कुछ देखने की मन की चाह को थोड़ी देर के लिए बंद कर लें।
कान से कुछ सुनने की चाह को बंद कर लें। उस समय न कोई संगीत चलता हो और न ही आस-पास लोग बातें करते हों। मुंह बंद रखें। खाने या बोलने की जीभ की चाह को बंद करें। अस्थायी रूप से ही सही, थोड़ी देर के लिए अपनी पांचों ज्ञानेंद्रियों के द्वारों को बंद कर लें। वृत्ति की धारा बाहर न जाने पाये।
आनंदमूर्ति गुरू मां
इनका जन्म 8 अप्रैल 1966 में हुआ था। उनकी उम्र के दूसरे बच्चे जब नर्सरी राइम पढ़ते थे तब मां वेदान्तों की फिलासिफी पढ़ती थीं। कई शहरों में घूमने के बाद अंत में उन्हें गंगा के किनारे बसे हुए शहर ऋषिकेश को पसंद किया। आनन्दमूर्ति गुरू मां देश के हर कोने में बसे लोगों को अपनी ज्ञान की पावन गंगा से कृतार्थ कर रहीं हैं।