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जानिए, आत्मा क्या है और हम सभी किससे उत्पन्न हुए हैं

Tue, 27 Jan 2015 03:09 PM IST
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य/ शांतिकुंज, हरिद्वार
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श्वेताश्वेतरोपनिषद् का ऋषि यह स्पष्ट करता है- ‘‘किं कारणं ब्रह्म कुतः स्मजाता जीवाम् केन क्वच सम्प्रतिष्ठाः। अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहेब्रह्म विदो व्यवस्थाम्॥’’
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अर्थात्-हे वेदज्ञ महर्षियों! इस जगत् का प्रधार कारण ‘ब्रह्म’ कौन है? हम सभी किससे उत्पन्न हुए हैं, किससे जी रहे हैं तथा किसमें प्रतिष्ठित हैं? साथ ही किसके अधीन रहकर हम लोग सुख और दुःख का अनुभव करते हैं।

इस प्रश्र के उत्तर की अर्थात् आत्मज्ञान की आवश्यकता यदि अनुभव की जा सके तो सर्वप्रथम यह विचार करना होगा कि हम कौन हैं? और क्यों जी रहे हैं? इस तथ्य पर आत्म्वेत्ता ऋषियेां ने गंभीर चिंतन एवं अनुसंधान से जो निष्कर्ष निकाले थे वे बहुत ही महत्वपूर्ण हैं तथा आत्मानुसंधान में प्रवृत्त होने के इच्छुक जिज्ञासुओं का मार्गदर्शन करने में सक्षम हैं।
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अणु की सत्ता की व्याख्या-विवेचना करने वाले वैज्ञानिक उसे सुविस्तृत पदार्थ वैभव का छोटा सा अविच्छिन्न घटक मानते हैं। आत्मा क्या है? परमात्म सत्ता का एक छोटा सा अंश। अणु की अपनी स्वतन्त्र सत्ता लगती भर है, पर जिस ऊर्जा आवेश के कारण उसका अस्तित्व बना है तथा क्रियाकलाप चल रहा है, वह व्यापक ऊर्जा तत्व से भिन्न नहीं है। एक ही सूर्य की अनन्त किरण संसार में फैली रहती है।

एक ही समुद्र में अनेकों लहरें उठती रहती हैं। ऐसा देखने पर प्रतीत होता है कि किरणों एवं लहरों की स्वतन्त्र सत्ता है जो परस्पर एक-दूसरे से भिन्न है। पर सत्य की गहराई में जाने पर पता चलता है कि भिन्नता कृत्रिम और एकता वास्तविक है।

अलग-अलग बर्तनों में आकाश की कितनी ही स्वतन्त्र सत्ताएं दिखायी पड़ती हैं, पर तथ्यतः उनका अस्तित्व निखिल आकाशीय सत्ता से भिन्न नहीं है। पानी में अनेकों बुलबुले उठते और विलीन होते रहते हैं। बहती धारा में कितने ही भँवर पड़ते हैं। दीखने में बुलबुले और भँवर अपना स्वतन्त्र अस्तित्व प्रकट कर रहे होते हैं, पर यथार्थ में वे प्रवाहमान जलधारा की सामयिक हलचलें मात्र हैं। जीवात्मा की स्वतन्त्र सत्ता दीखती भर है, पर उसका अस्तित्व एवं स्वरूप विराट चेतना का ही एक अंश है।

इस निष्कर्ष के आधार पर ही अध्यात्मवेत्ताओं ने कहा कि ‘हम विश्व चेतना के एक अंश मात्र हैं। समष्टि ही आधारभूत सत्ता है। हम उसकी छोटी चिनगारी भर हैं। व्यष्टि और समष्टि की एकता शाश्वत है-पृथकता कृत्रिम। सबमें अपने को और अपने में सबको समाया हुआ, देखा, समझा और माना जाय। सबके हित में अपना हित सोचा जाय। परस्पर एक-दूसरे के सुख-दुःख को अपना ही सुख-दुःख माना जाय।

सबका उत्थान अपना उत्थान और सबका पतन अपना पतन, यह मानकर चलने से सीमित परिधि में सुखी रहने की क्षुद्रता घटती है तथा आत्मविस्तार की प्रेरणा उठती है। सीमा संकीर्णता से निकलने से व्यक्तिवाद पर अवलम्बित स्वार्थपरता घटती है। मनुष्य अपने को विराट समाज का अभिन्न अंग मानने लगता है।
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