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कहीं ऐसा न हो कि कल के इंतजार में आज भी निकल जाए

Thu, 15 Mar 2018 03:30 AM IST
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला
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खान साहब की कहानी, जिन्हें एक बुजुर्ग ने कहा कि जीवन की आपाधापी में अपनों की उपेक्षा ठीक नहीं।

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खान साहब वक्त के बड़े पाबंद थे। वह रोज ठीक नौ बजे अपने ऑफिस पहुंच जाते थे और शाम को ऑफिस बंद करके ही घर लौटते थे। शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि खान साहब समय से पहले घर लौटे हों। लेकिन उस दिन अचानक उनके थोड़े जल्दी घर लौटने पर घर के सारे लोग हैरान रह गए। सब उनसे उनकी तबीयत के बारे में पूछने लगे। खान साहब बोले, मैं एकदम ठीक हूं।

बस आज एक ऐसे शख्स से मुलाकात हुई, जिसने मेरी सोच बदल दी। इसलिए मैं आज घर कुछ जल्दी आ गया। और अब से मैं रोज घर जल्दी आ जाया करूंगा। खान साहब का बेटा जाकिर बोला, लेकिन अब्बू, आज ऐसा क्या हो गया, जो आपके मिजाज बदल गए? सब खैरियत तो है न। खान साहब बोले, बेटे, जब तुम छोटे थे, तब कितनी बार तुमने मेरी कमीज गीली की थी, इसका तुम्हें पता है! मैं यों ही तुम्हें गोद में उठाकर मोहल्ले में घुमाया करता था। ऑफिस जाता, तो भी तुम्हें अपने साथ ले जाया करता था।
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जाकिर हैरानी से खान साहब की तरफ देख रहा था। कितने अच्छे दिन थे वे। अब तो याद भी नहीं आता कि आखिरी बार तुम्हें गले कब लगाया होगा। तुम बड़े क्यों हो गए? थोड़ा रुककर वह बोले, आज जब मैं ऑफिस पहुंचा, तो मैंने देखा कि एक बुजुर्ग अपने बेटे के लिए एक फ्लैट खरीदने आए थे। उन्होंने भी मेरी तरह पूरा जीवन अपने काम को समर्पित कर दिया। अब अंततः वह काम से फारिग होकर अपने परिवार के साथ समय बिताना चाहते थे।
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लेकिन उन्हें इस बात का मलाल था कि जब बेटे के पास समय था, तब उनके पास समय नहीं था। और अब जब उनके पास समय है, तब उनका बेटा उनके लिए समय नहीं निकाल पाता। उन्होंने मुझसे कहा कि जिंदगी अगर अब भी पकड़ में आ जाए, तो परिवार के साथ कुछ समय गुजार लो। उनके अनुभव से मैंने यह सीख ली कि जिन ख्वाबों को मैं आने वाले कल में पूरा करना चाहता था, उन्हें आज ही क्यों न पूरा कर लूं!

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