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भला महिलाएं क्यों नहीं कर सकती हैं पितरों का श्राद्घ?

Thu, 19 Sep 2013 12:22 PM IST
टीम डिजिटल
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श्राद्ध पक्ष में पितरों को प्रसन्न करने के लिए श्राद्ध का नियम है। परंपरागत तौर पर यह कार्य पुरूष ही करते हैं। ऐसी परंपरा बन गयी है कि स्त्रियों को श्राद्ध नहीं करना चाहिए। जबकि गरूड़ पुराण में भी यह उल्लेख मिलता है कि विशेष परिस्थिति में महिलाएं श्राद्ध कर सकती हैं।
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गरूड़ पुराण में कहा गया है कि जिनके वंशज श्राद्ध और तर्पण नहीं करते हैं उनके पितृगण प्रेत लोक में जाते हैं और उन्हें कष्ट भोगना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठता है कि जिस व्यक्ति को पुत्र संतान नहीं है केवल कन्या संतान है क्या उसकी कन्या अपने पितरों का श्राद्ध नहीं कर सकती है। उनके पितर प्रेत लोक में जाएंगे वह भी इसलिए कि वह पुत्र के पिता नहीं हैं?

श्राद्ध के विषय में कहा गया है कि श्रद्धा से श्राद्ध होता है। इसलिए किसी व्यक्ति की केवल कन्या संतान है तो कन्या श्रद्धापूर्वक अपने पितरों का श्राद्ध कर सकती है। कन्या द्वारा प्रदान किया गया श्राद्ध और पिण्ड भी पितर स्वीकार करते हैं।
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पुत्र की अनुपस्थिति में पुत्रवधू भी पिण्डदान कर सकती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण बाल्मिकी रामायण में मौजूद है। बाल्मिकी रामायण के एक प्रसंग में वर्णन मिलता है कि राम और लक्ष्मण की अनुपस्थिति में सीता जी ने दशरथ जी का पिण्डदान किया। दशरथ जी सीता के हाथों से पिण्डदान प्राप्त करके तृप्त हो गये।

शास्त्र कहता है कि पुत्र के नहीं होने पर पत्नी अथवा पुत्री श्राद्ध कर सकती है। पुत्र के नहीं होने पर पुत्रवधू को भी श्राद्ध का अधिकार दिया गया है। वर्तमान में इस दिशा में अब पहल भी शुरू हो गयी है। इलाहाबाद में स्त्रियों को कर्मकाण्ड की शिक्षा देकर पुरोहित भी बनाया जा रहा है।
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महाराष्ट्र में भी इस तरह की पहल शुरू हो चुकी है। लेकिन एक बात ध्यान रखने योग्य है जो भी स्त्री श्राद्ध करें उन्हें पवित्रता का पूरा ध्यान रखना चाहिए।
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