सांप को देखते ही आपके मन में पहला विचार क्या आता है। आप सोचते होंगे, सांप जहरीला तो नहीं है, किसी को काट न ले। किसी तरह सांप को मारने की कोशिश आप करते होंगे। जबकि, भारतीय धर्म ग्रंथों में सांप को देवताओं के समान पूजनीय बताया गया है।
नागपंचमी के दिन श्रद्धा भाव से लोग इनकी पूजा करते हैं और नाग से विनती करते हैं कि घर में धन-धान्य बढ़े एवं उनके परिवार के सदस्यों को सांप न काटे। जबकि अन्य दिनों में सांप को देखते ही भय से रोंगटे खड़े होने लगते हैं। सांप से भय का कारण सांप नहीं बल्कि उनके अंदर मौजूद विष होता है।
विष्णु पुराण के अनुसार सांप पहले विषहीन हुआ करते थे। लेकिन जब सागर मंथन हुआ और समुद्र से एक-एक करके चीजें निकलने लगी तो उसी क्रम में समुद्र से हलाहल नामक विष भी निकला। इस विष का प्रभाव इतना था कि देवता भी इससे आहत होने लगे। देवतागण चिंतित हो गये कि हलाहल अगर संसार में रह गया तो कोई भी जीवित नहीं रह पाएगा।
देवताओं की चिंता दूर करने के लिए भगवान शिव हलाहल पी गये। इससे शिव का गला नीला पड़ गया और शिव नीलकंठ कहलाये। लेकिन शिव द्वारा विष पीते समय विष की कुछ बूंदें पृथ्वी पर गिर पड़ी। सांप और बिच्छूओं ने इस विष को पी लिया।
विष्णु पुराण में जो कथा मिलती है उसके अनुसार सांपों के विषैले होने का कारण यही है। सांपों की इसी गलती के कारण मनुष्य सांप से भयभीत होता है और उसे अपना शत्रु मानता है।