नवग्रहों में सबसे मंद गति होने के कारण शनि
महाराज सबसे लंबे समय तक एक ही राशि में टिके रहते हैं। इनकी दशा भी सबसे लंबी होती
है। भगवान शिव ने शनि महाराज को नवग्रहों में न्यायाधीश का पद दिया है। शनि देव जो
भी न्याय करते हैं उसका फल राहु केतु देते हैं।
शनि के न्याय में किसी
प्रकार का भेद-भाव नहीं होता है। इसलिए शनि के नाम से सामान्य व्यक्ति ही नहीं
बल्कि राजे-महाराजे एवं देवताओं को भी भय होता है। एक बार तो शनिदेव के भय से
महादेव भी कैलाश छोड़कर भाग गये, लेकिन शनि ने उनका पीछा नहीं छोड़ा और शनि दशा के
कारण महादेव को भी कष्ट का सामना करना पड़ा।
पुराणों में कथा है कि एक बार
शिव ने शनि से पूछा कि क्या तुम्हारी दशा में मुझे भी कष्ट भोगना पड़ेगा। इस पर शनि
ने उत्तर दिया कि प्रभु आपने ही मुझे न्यायाधीश बनाया है, मैं किसी के प्रति अन्याय
नहीं करता। मेरी दशा में सभी को अपने कर्म का फल भुगतना पड़ता है, इससे न तो मनुष्य
बच सकते हैं न ही देवी-देवता और आप। इसके बाद शनि देव ने शिव से कहा कि कल मैं आपकी
राशि में आ रहा हूं। पूरे दिन मैं आपकी राशि में रहूंगा।
शनि की बात सुनकर
शिव ने सोचा कि शनि से बचने के लिए कुछ न कुछ उपाय तो करना होगा। अगले दिन सुबह
भगवान शिव कैलास छोड़कर पृथ्वी पर आ गये और हाथी बनकर कोकिला वन में विचरने लगे।
कोकिला वन शनि महाराज का वन है, शनि महाराज यहां निवास करते हैं। भगवान शिव ने सोचा
कि शनि तो कैलास में रहेगा इसलिए मैं उसके ही वन में रहता हूं।
शाम होने पर
शिव जी ने सोचा कि अब तो शनि मेरा इंतजार करके थक गया होगा और कैलाश से लौट रहा
होगा। यह विचार करके शिव जी ने हाथी का रूप त्याग दिया और वास्तविक रूप में आ गये।
इसके बाद शिव जी कैलाश की ओर चल पड़े। कैलाश पहुंचने पर देखा कि शनि अब भी कैलाश पर
मौजूद है। शिव जी ने मुस्कुरा कर शनि से कहा कि मैं तुम्हारे प्रभाव से बचा रहा।
शनि ने कहा कि प्रभु देव योनि से पशु योनी मैं आज आपको रहना पड़ा यह मेरी दशा का ही
प्रभाव है।
भगवान शिव शनि के भेद-भाव रहित न्याय से प्रसन्न हुए और
आशीर्वाद दिया। शनि से शिव ने कहा कि अब से तुम्हारी दशा का प्रभाव कैलाश क्षेत्र
एवं मेरे भक्तों पर नहीं होगा। यही कारण है कि महामृत्युंजय मंत्र जप, शिव की
नियमित पूजा करने वाले को शनि अपनी दशा में अधिक नहीं सताते हैं।