सृष्टि के रचनाकार ब्रह्मा जी
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विक्रम संवत का धार्मिक महत्व
वैदिक शास्त्रों और पुराणों के अनुसार सृष्टि के निर्माता भगवान ब्रह्मा जी ने चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को इस संसार को रचा था, इसलिए इस पावन तिथि को 'नव संवत्सर' पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। नवरात्रि व्रत भी इसी तिथि से प्रारंभ होता है।
विक्रम संवत है पूर्ण रूप से वैज्ञानिक
विक्रम संवंत सबसे अधिक प्रासंगिक, सार्वभौमिक और वैज्ञानिक कैलेंडर है। यह सौर्य और चंद्रमा की गणना पर आधारित है। हिंदू पंचांग की गणना के आधार पर यह हजारों साल पहले बता दिया था कि अमुक दिन, अमुक समय पर सूर्यग्रहण होगा। युगों बाद भी यह गणना सही और सटीक साबित हो रही है।
पक्ष
एक माह में दो पक्ष होते हैं-
- शुक्ल पक्ष
- कृष्ण पक्ष
तिथियां
एक पक्ष में पंद्रह तिथियां होती हैं। जहां शुक्ल पक्ष की आखिरी तिथि को
पूर्णिमा और कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि को
अमावस्या कहते हैं। पंद्रह तिथियों के नाम -
- प्रतिपदा
- द्वितीय
- तृतीया
- चतुर्थी
- पंचमी
- षष्ठी
- सप्तमी
- अष्टमी
- नवमी
- दशमी
- एकादशी
- द्वादशी
- त्रयोदशी
- चतुर्दशी
- अमावस्या/पूर्णिमा
छह ऋतुओं के नाम
हिन्दू वर्ष वर्ष के मुताबिक भारत में एक वर्ष के अंतर्गत छह ऋतुएं आती हैं ये छह ऋतु इस प्रकार हैं..
- वसन्त
- ग्रीष्म
- वर्षा
- शरद
- हेमन्त
- शिशिर
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के जिस दिन (वार) से विक्रमी संवत शुरू होता है, वही इस संवत का राजा होता है। सूर्य जब मेष राशि में प्रवेश करता है, तो वह संवत का मंत्री होता है। विक्रम संवत समस्त संस्कारों, पर्वों एवं त्योहारों की रीढ़ माना जाता है। समस्त शुभ कार्य इसी पंचांग की तिथि से ही किए जाते हैं। यहां तक की वित्तीय वर्ष भी हिन्दू नववर्ष से प्रारंभ होता है और समाप्त भी इसी के साथ होता है।