फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

उत्पन्ना एकादशी: श्री विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुई थी एकादशी, जानें पूरी कथा

Mon, 18 Nov 2019 12:54 PM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन, वास्तुविद
विज्ञापन
एकादशी व्रत कथा
विज्ञापन
मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष  की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी का व्रत किया जाता है। इस वर्ष यह व्रत 22 नवम्बर को है। पद्मपुराण के अनुसार मार्गशीर्ष मास की कृष्ण एकादशी के दिन देवी एकादशी का जन्म हुआ था, जिन्होंने मुर नामक दैत्य का वध कर भगवान विष्णु की रक्षा की थी। यह व्रत पूर्ण नियम, श्रद्धा व विश्वास के साथ रखा जाता है, इस व्रत को करने से धर्म एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि इस व्रत के फलस्वरुप मिलने वाले फल अश्वमेघ यज्ञ, कठिन तपस्या, तीर्थों में स्नान-दान आदि से मिलने वाले फलों से भी अधिक होते है।
विज्ञापन


देवी एकादशी एवं श्री हरि की करें पूजा
एकादशी के व्रतों में उत्पन्ना एकादशी व्रत को मुख्य स्थान प्राप्त है। इस दिन देवी एकादशी सहित  भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करने का विधान है। इस दिन ब्रह्रा मुहूर्त समय में भगवान का पुष्प, धूप, दीप, चन्दन,अक्षत,फल,तुलसी आदि से पूजन करना चाहिए, इस व्रत में केवल फलाहार का ही भोग लगाया जाता है।'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप एवं इस दिन विष्णु सहस्त्र्नाम का पाठ करना अति उत्तम रहता हैं।संध्या के समय देवालय में दीपदान करने से पुण्य फलों में वृद्धि होती है एवं श्री विष्णु की कृपा पाने के लिए रात्रि में भजन-कीर्तन आदि करें।

एकादशी व्रत की महिमा
शास्त्रों के अनुसार जो मनुष्य एकादशी को उपवास करता है,वह वैकुण्ठधाम में,जहाँ साक्षात् गरुणध्वज विराजमान हैं,जाता हैं। जो मनुष्य एकादशी माहात्म्य का पाठ करता हैं,उसे सहस्त्र गोदानों के पुण्य का फल प्राप्त होता हैं। जो दिन या रात में भक्ति पूर्वक इस माहात्म्य का श्रवण करते हैं,वे निसंदेह सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाते हैं। एकादशी के समान पापनाशक व्रत कोई अन्य नहीं हैं ऐसा शास्त्रों का मत हैं।    
विज्ञापन


जब देवी एकादशी ने की श्री विष्णु की रक्षा
सतयुग में एक महाभयंकर दैत्य मुर हुआ करता था। दैत्य मुर ने इन्द्र आदि देवताओं पर विजय प्राप्त कर उन्हें, उनके स्थान से भगा दिया। तब इन्द्र तथा अन्य देवता क्षीरसागर में भगवान श्री विष्णु के पास गए । देवताओं सहित सभी ने श्री विष्णु जी से दैत्य के अत्याचारों से मुक्त होने के लिये विनती की। इन्द्र आदि देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान श्री विष्णु बोले -देवताओं मै तुम्हारे शत्रु का शीघ्र ही वध करूंगा।जब दैत्यों ने श्री विष्णु जी को युद्ध भूमि में देखा तो उन पर अस्त्रों-शस्त्रों का प्रहार करने लगे। भगवान श्री विष्णु मुर को मारने के लिये जिन-जिन शस्त्रों का प्रयोग करते वे सभी उसके तेज से नष्ट होकर उस पर पुष्पों के समान गिरने लगे़ ।श्री विष्णु उस दैत्य के साथ सहस्त्र वर्षों तक युद्ध करते रहे़ परन्तु उस दैत्य को न जीत सके। अंत में विष्णुजी शान्त होकर विश्राम करने की इच्छा से बद्रिकाश्रम में सिंहावती नाम की गुफा,जो बारह योजन लम्बी थी, उसमें शयन करने के लिये चले गये।दैत्य भी उस गुफा में चला गया, कि आज मैं श्री विष्णु को मार कर अपने सभी शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लूंगा। उस समय गुफा में एक अत्यन्त सुन्दर कन्या उत्पन्न हुई़ और दैत्य के सामने आकर युद्ध करने लगी। दोनों में देर तक युद्ध हुआ एवं  उस कन्या ने राक्षस को धक्का मारकर मूर्छित कर दिया और उठने पर उस दैत्य का सिर काट दिया इस प्रकार वह दैत्य मृत्यु को प्राप्त हुआ।उसी समय श्री हरि की निद्रा टूटी,दैत्य को मरा हुआ देखकरआश्चर्य हुआ और विचार करने लगे कि इसको किसने मारा। इस पर कन्या ने उन्हें कहा कि दैत्य आपको मारने के लिये तैयार था उसी समय मैने आपके शरीर से उत्पन्न होकर इसका वध किया है। भगवान श्री विष्णु ने उस कन्या का नाम एकादशी रखा क्यों कि  वह एकादशी के दिन श्री विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुई थी इसलिए इस दिन को उत्पन्ना एकादशी के नाम से जाना जाता है।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें