शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग है सोमनाथ ज्योतिर्लिंग। इस ज्योतिर्लिंग का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। आक्रमणकारियों ने इस मंदिर पर छह बार आक्रमण किया। इसके बावजूद मंदिर पुण्य परमार्थ और सांप्रदायिक सद्भाव का परिचायक है। सातवीं बार यह मंदिर कैलाश महामेरु प्रसाद शैली में बनाया गया है।
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यह मंदिर गर्भगृह, सभामंडप और नृत्यमंडप- तीन प्रमुख भागों में विभाजित है। पचास मीटर से ऊंचे शिखर पर स्थित कलश का भार दस टन है और इसकी ध्वजा नौ मीटर ऊंची है। इसके अबाधित समुद्री मार्ग- त्रिष्टांभ के विषय में ऐसा माना जाता है कि यह समुद्री मार्ग परोक्ष रूप से दक्षिणी ध्रुव में समाप्त होता है।
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यह हमारे प्राचीन ज्ञान व सूझबूझ का अद्भुत साक्ष्य माना जाता है। यहां की यात्रा अपने लिए दिव्य अनुभव थी। मंदिर के अंदर का सौंदर्य अकल्पनीय था। वैदिक ब्राह्मणों द्वारा वेदपाठ हो रहा था, जिसकी गूंज में अंतर्मन आनंदित हो रहा था। ज्योतिर्लिंग की शोभा अद्भुत थी, हमने भी वहां पर मंत्र का जप किया।
मंदिर के शिखर की ऊंचाई 155 फीट है। इसके शिखर में बृषभ चिन्ह वाली ध्वजा, डमरू और त्रिशूल के साथ लहरा रही है। सोमनाथ की आरती सुबह, दोपहर और शाम, तीन बार होती है। यहां से कुछ दूरी पर हिरण्या, कपिला, सरस्वती नदी का संगम है।