भुवनेश्वर एयरपोर्ट से 65 और जगन्नाथपुरी से 36 किलोमीटर दूर सूर्य उपासना का प्रधान पीठ है 'कोणार्क'। मंदिर परिसर का विस्तार कई एकड़ क्षेत्रफल में है। बारहवीं सदी की अकल्पनीय शिल्पकला के मूक साक्षी कोणार्क में लगे पत्थरों के शिल्प को देखकर पर्यटक अवाक रह जाते हैं।
यहां उकेरी मिथुन मूर्तियों में वात्स्यायन के 'कामसूत्र' का पत्थरों पर उकेरा गया अनुवाद प्रस्तुत है।
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परिसर से बाहर दक्षिण की ओर दो सौ गज की दूरी पर ही उपवन 'अवधूत मठ' है। यहीं एक अवधूत स्वामी के दर्शन का सौभाग्य मिला। उनसे सूर्यदेव की जन्मस्थली 'अर्कक्षेत्र' के विषय में अनेकों सवाल किए।
उन ज्ञानमूर्ति श्री स्वामी जी ने हमारे एक-एक सवाल का सविस्तार उत्तर दिया। वे हमें उस स्थान तक ले गए जहां महर्षि कश्यप और माता अदिति ने भगवान सूर्य को पुत्र रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या की थी। मां अदिति के पुत्र होने के कारण ही सूर्य का एक नाम आदित्य और इस स्थान का नाम 'अर्कक्षेत्र' पड़ा।
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इस स्थान पर सूर्य को अतिप्रिय 'चाक्षुसी मंत्र' का पाठ करने से लौकिक-पारलौकिक दोनों प्रकार की ज्योति सहज ही प्राप्त हो जाती है। महर्षि दुर्वासा के द्वारा शापित कृष्ण पुत्र साम्ब भी इसी स्थान पर सूर्य की तपस्या कर कुष्ट रोग से मुक्त हुए थे। यहां से कुछ दूरी पर पवित्र चंद्रभागा नदी है।