ग्रहण काल में पूजा पाठ करना मना क्यों होता है
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ग्रहण को अशुभ क्यों माना जाता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण के दौरान सूर्य देव या चंद्र देव राहु-केतु के प्रभाव में आ जाते हैं। इससे उनकी शक्ति क्षीण हो जाती है और चारों ओर नकारात्मकता फैलने लगती है। यही कारण है कि इस समय को अशुभ माना जाता है। ज्योतिष के अनुसार, ग्रहण के दौरान आसुरी शक्तियां प्रभावी हो जाती हैं, जिससे शुभ कार्यों में विघ्न पड़ सकता है।
ग्रहण से कुछ घंटे पहले ही सूतक काल लग जाता है, जो ग्रहण समाप्त होने तक रहता है। इस दौरान मंदिरों के द्वार बंद कर दिए जाते हैं और पूजा-पाठ पर रोक लग जाती है। ऐसा माना जाता है कि ग्रहण के दौरान किए गए किसी भी कार्य का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, इसलिए इस समय कोई भी शुभ कार्य करने की मनाही होती है।
ग्रहण काल में पूजा पाठ करना मना क्यों होता है
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ग्रहण के दौरान क्यों नहीं किया जाता पूजा पाठ?
- ग्रहण के दौरान पूजा-पाठ नहीं करने के पीछे धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताएं हैं। माना जाता है कि इस समय वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा अत्यधिक सक्रिय हो जाती है, जिससे सकारात्मक शक्तियां कमजोर पड़ जाती हैं। इस कारण देवताओं की कृपा प्राप्त करने के लिए किए जाने वाले पूजा-पाठ का उचित फल नहीं मिलता। धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है कि जब सूर्य या चंद्र ग्रहण के प्रभाव में होते हैं, तो उनकी शक्ति क्षीण हो जाती है, जिससे इस दौरान की गई उपासना निष्फल हो सकती है। इसी कारण हिंदू धर्म में ग्रहण काल को अशुभ माना गया है।
- इसके अलावा, ग्रहण के समय सूतक काल लगता है, जो किसी भी शुभ कार्य के लिए प्रतिकूल माना जाता है। इस दौरान मंत्र जाप, हवन और देव आराधना करने से लाभ की बजाय हानि हो सकती है। यही कारण है कि मंदिरों के द्वार भी इस अवधि में बंद कर दिए जाते हैं और पूजा-पाठ पर रोक लगा दी जाती है।
- ग्रहण का प्रभाव न केवल आध्यात्मिक बल्कि शारीरिक रूप से भी देखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान भोजन दूषित हो जाता है, जिससे बीमारियां हो सकती हैं। यही वजह है कि ग्रहण के समय पका हुआ भोजन खाने से बचने और इसे तुलसी के पत्ते डालकर सुरक्षित करने की परंपरा है।
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी ग्रहण के दौरान कुछ हानिकारक किरणें उत्सर्जित होती हैं, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती हैं। विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं को इस समय सतर्क रहने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इसका प्रभाव अजन्मे शिशु पर भी पड़ सकता है। इसी कारण ग्रहण के दौरान सावधानी बरतने और धार्मिक नियमों का पालन करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।