यह कथा है राजा नहुष की। एक समय वृत्रासुर का वध करने के कारण इन्द्र को ब्रह्महत्या का पाप लग गया। इन्द्र देवराज का पद त्यागकर जल में छुप गए। ऐसे में धर्मात्मा राजा नहुष को देवराज के पद पर बैठ दिया गया।
देवराज के पद पर बैठते ही नहुष अहंकारी हो गया और एक दिन जब इन्द्र की पत्नी शचि को देखा तो काम से पीड़ित होकर उसे अपने महल में बुलवा लिया। परेशानी इन्द्राणी इन्द्र के पास पहुंची और अपनी लाज बचाने के उपाय पूछने लगी।
इन्द्र ने शचि को सलाह दी कि नहुष से कहना अगर मुझे अपनना चाहते हो तो ऋषियों की पालकी पर चढ़कर मेरे पास आओ। अहंकार में डूबे नहुष ने इन्द्राणी की शर्त स्वीकार कर ली और एक पालकी पर बैठकर ऋषियों को उसे उठाने के लिए कहा।
देवराज के पद का मान रखने के लिए ऋषियों ने पालकी को अपने कंधे पर उठा लिया। लेकिन पालकी उठाने में अकुशल ऋषिगण धीरे-धीरे चल रहे थे। इससे क्रोधित होकर नहुष ने अगस्त ऋषि को एक लात मार दी।
फिर क्या था, ऋषि क्रोधित हो गए और नहुष को शाप दे दिया कि इसी समय अजगर बनकर पृथ्वी पर चले जाओ और इस रुप में दस हजार साल तक रेंगते रहो। नहुष के सिर से काम का नशा उतार गया और क्षमा मांगने लगा।
लेकिन ऋषियों ने नहुष को क्षमा दान देने से मना कर दिया। जब पाण्डव वन में भटक रहे थे, उस समय युधिष्ठिर ने नहुष को सर्प योनि से मुक्ति दिलाई। इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि काम के वेग को नियंत्रित रखना चाहिए अन्यथा विनाश तय है।