सरस्वती ने कहा कि रामचरित के साथ ही काव्य रचना का भी आरंभ होता है। वाल्मीकि रामायण के सृजन, प्रेरणा की गाथा में इस महाकाव्य से एक परंपरा शुरू होती है।
सरस्वती विद्या की देवी हैं। मां शारदा शुभ्र वस्त्रों में हैं। उनसे वाणी और संगीत का प्रवाह होता है। उनकी वीणा के तारों में जीवन की मधुर झंकार है। उनके पूजन के लिए सफेद पुष्प चाहिए। मां शारदा का ध्यान मन को तंरगित करने वाला, ज्ञान की ज्योत जगाने वाला है। बच्चों के लिए वह ममतामयी है।
हंस पर बैठी, हाथों में वीणा लिए मां शारदा का स्वरूप दिव्य अनुभूति से भर देता है। इनके पूजन में सबसे पहले आचमन की प्रक्रिया है। स्वच्छ वस्त्रों को पहन कर जल को भूमि पर छिड़ककर पूजन का संकल्प किया जाता है।
कलश स्थापित किया जाता है। उसमें देवी सरस्वती का आवाहन करके वैदिक या पौराणिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। श्री श्री सरस्वत्यै नमः इस अष्टाक्षर मंत्र के जरिये प्रत्येक वस्तु सरस्वतीजी को समर्णण करें। अंत में देवी सरस्वती की आरती करके उनकी स्तुति करें।
स्तुति गान में सांगीतिक आराधना भी की जाती है। भगवती को निवेदित गंघ पुष्प मिष्ठान आदि प्रसाद चढ़ाना चाहिए। पुस्तक और लेखनी में भी देवी का निवास स्थान माना जाता है। पुराणों में वर्णित आख्यान में कहा गया है कि श्रीमन्नारायण भगवान ने वाल्मीकि को सरस्वती का मंत्र बताया था, जिसके जप से उनमें कवित्व शक्ति उत्पन्न हुई।
महर्षि वेदव्यास की उपासना से खुश होकर सरस्वती ने उनसे कहा कि ये वाल्मीकि रामायण मेरी ही प्रेरणा से रची गई है। वह इस लोक का सर्वप्रथम काव्य है। दुनिया के तमाम काव्य रचनाएं इस ग्रंथ के बाद ही लिखी गईं। मान्यता है कि वाल्मीकि रामायण से पहले साहित्य में कविता नामक विधा का कोई अस्तित्व ही नहीं था।
आदि कविता के बारे में मान्यता तो यह है कि एक बहेलिए ने क्रोंच पक्षी का वध कर दिया था। उस वध के बाद वाल्मीकि के मुंह से पहला छंद अनायास ही प्रकट हुआ। वह छंद सरस्वती के आशीर्वाद से ही जन्मा था। उसके बाद रामायण और दूसरी काव्य रचनाएं लिखी गईं। फिर तो कविता का ऐसा उभार आया कि लाख पन्नों के गद्य की तुलना में गीत-कविता ज्यादा प्रभावशाली हो गए।