वैसे तो प्रत्येक माह के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को 'मास शिवरात्रि' के रूप में मनाया जाता है, लेकिन फाल्गुन की शिवरात्रि इनमे प्रमुख है।
इसी तिथि को पार्वती और शिव वैवाहिक बंधन में बंधे थे। शिव के बामभाग से ही शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ है, वह शक्ति कालान्तर में असुरों का संहार करने के लिए नौ दुर्गा के रूप में आई।
मां के असंख्य रूपों में प्रमुख नौ रूपों को 'पति' रूप में दर्शन देने के लिए महाकाल को भी फाल्गुन कृष्ण पक्ष की पंचमी से लेकर त्रयोदशी तक दूल्हे के रूप में सजाया जाता है।
इसे ही नौ दिवसीय शिवरात्रि कहते हैं। महाकाल के घटाटोप, उमा-महेश, मनमहेश, चंद्रमौलेश्वर, शिवतांडव, होल्कर, छबीना, गरुड़ध्वज, आदि रूपों का प्रतिदिन चांदी के नए नए रूपों आकारों से श्रृंगार किया जाता है।
इसलिए बदल जाता है आरती का समय
ज्योतिर्लिंग पर प्रतिदिन विभिन्न फलों के रस से अभिषेक करने के बाद दूध, दही, घी, शहद, शकर, के पंचामृत से स्नान कराकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना के साथ 11 वैदिक विद्वानों के जरिए गर्भगृह में ही रुद्राभिषेक पाठ होता है।
उज्जियनी नगरी के महाराजाधिराज कहे जाने वाले भगवान महाकाल के पूजन-अनुष्ठान के मध्य प्रतिदिन गर्भगृह में चार घंटे तक प्रवेश बंद रहता है।
इसी क्रम में शिवरात्रि को 'महानिशीथकाल' में श्रीमहाकाल का विशेष पूजन-अर्चन होता है। जिनमें अष्टमूर्ति, पंचवक्र, पंचतत्व में पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश आदि स्वरूपों का वेदमंत्रों से पूजन होता है।
आमतौर पर ब्रह्म मुहूर्त में होने वाली भस्म आरती महाशिवरात्रि के बजाय दूसरे दिन दोपहर को होती है।