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Rudrashtakam Stotram: इस तरह करें 'शिव रुद्राष्टकम' का पाठ, धन प्राप्ति के साथ शत्रुओं पर भी मिलेगी विजय

Mon, 16 Jan 2023 11:31 AM IST
आशिकी पटेल धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Shiv Rudrashtakam Stotram: यदि आप शिव जी की विशेष कृपा पाना चाहते हैं 'श्री शिव रूद्राष्टकम' का पाठ जरूर करें। 'शिव रुद्राष्टकम' अपने-आप में अद्भुत स्तुति है। इसके पाठ से जीवन की सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। 
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इस तरह करें 'शिव रुद्राष्टकम' का पाठ - फोटो : iStock
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विस्तार
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Rudrashtakam Stotram Benefits and Lyrics: शिव जी को सभी देवों में सबसे उच्च स्थान प्राप्त है। इसलिए उन्हें देवों के देव महादेव कहा जाता है। शिव जी का स्वरूप बड़ा ही सरल माना जाता है। वे आसानी से प्रसन्न हो जाने वाले देवता हैं। यदि कोई भक्त श्रद्धा पूर्वक उन्हें केवल एक लोटा जल भी अर्पित कर दे तो भी वे प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान शिव शंकर की पूजा करने से जातक को जीवन में कभी भी सुखों की कमी महसूस नहीं होती है। वहीं यदि आप शिव जी की विशेष कृपा पाना चाहते हैं 'श्री शिव रूद्राष्टकम' का पाठ जरूर करें। 'शिव रुद्राष्टकम' अपने-आप में अद्भुत स्तुति है। इसके पाठ से जीवन की सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। यहां श्री शिव रूद्राष्टकम स्तुति, इसका हिंदी अर्थ और महत्व दिए जा रहे हैं, जिसकी मदद से आप इसका पाठ कर सकते हैं...

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श्री शिव रुद्राष्टकम पाठ का महत्व और जाप विधि
शास्त्रों के अनुसार, यदि शत्रु से परेशान हैं तो किसी शिव मंदिर या घर में ही कुशा के आसन पर बैठकर लगातार 7 दिनों तक सुबह शाम 'रुद्राष्टकम' स्तुति का पाठ करें। ऐसा करने से शिव जी बड़े से बड़े शत्रुओं का नाश पल भर में करते हैं। कहा जाता है कि भगवान श्रीराम ने भी रावण पर विजय पाने के लिए रामेशवरम में शिवलिंग की स्थापना कर रूद्राष्टकम स्तुति का पाठ किया था और परिणाम स्वरूप शिव की कृपा से रावण पर उन्होंने विजय प्राप्त कर ली। 

शिव रुद्राष्टकम पाठ

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नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम्

निराकारमोङ्करमूलं तुरीयं
गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकालकालं कृपालं
गुणागारसंसारपारं नतोहम्

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं
मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम् ।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा
लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं ।
त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं
भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम्

कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।
चिदानन्दसंदोह मोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी

न यावद् उमानाथपादारविन्दं
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं

न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् ।
जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो

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