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शनि को क्यों कहा जाता है न्यायाधिपति और क्या ये सभी को देते हैं हमेशा कष्ट ? जानिए

Wed, 02 Apr 2025 01:58 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

सभी नवग्रहों में शनिदेव का विशेष स्थान होता है। शनि सबसे धीमी चाल से चलने वाले ग्रह होते हैं जिसके कारण वैदिक ज्योतिष के फलित में इनकी विशेष भूमिका होती है।
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शनि का ज्योतिष शास्त्र में क्या है महत्व - फोटो : adobe stock
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विस्तार
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शनि हाल के दिनों में सबसे ज्यादा चर्चा में थे, क्योंकि शनि का राशि परिवर्तन ढाई वर्षों बाद हुआ था। शनिदेव 29 मार्च 2025 को अपनी स्वराशि कुंभ की यात्रा को विराम देते हुए गुरु की राशि मीन में प्रवेश कर चुके हैं। जहां पर ये साल 2027 तक मीन राशि में रहेंगे। सभी नवग्रहों में शनिदेव का विशेष स्थान होता है। शनि सबसे धीमी चाल से चलने वाले ग्रह होते हैं जिसके कारण वैदिक ज्योतिष के फलित में इनकी विशेष भूमिका होती है। शनिदेव सूर्यदेव का पुत्र हैं लेकिन इनकी अपने पिता से शत्रुता का भाव रहता है। शनिदेव दण्डाधिकारी और न्यायधिकारी का दर्जा प्राप्त है। ये दर्जा इन्हें भगवान शिव ने इनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर दिया था। इस तरह से शनिदेव व्यक्तियों को उनके कर्मों के आधार पर शुभ फल या दंड देते हैं। शनिदेव व्यक्तियों को उनके कर्मों के आधार पर अपनी दशाओं, साढ़ेसाती और ढैय्या के रूप में फल प्रदान करते हैं।  
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आम लोगों के मन में शनि के बारे में ऐसी धारणा बनी हुई है कि शनि का नाम आते ही लोग घबरा जाते हैं। लेकिन क्या शनिदेव हमेशा लोगों को दंड या कष्ट देते हैं? ऐसी धारण गलत है। शनि जहां दंड देने के अधिकारी है तो वहीं शनि किसी को भी रंक से राजा भी बना देते हैं। शनि की शुभ द्दष्टि से व्यक्ति अच्छे मुकाम पर पहुंच जाता है। व्यक्ति उच्च से उच्च पदों को हासिल करने में कामयाब रहता है। व्यक्ति धनी और उच्च राजनेता भी बन सकता है। शनि की धीमी चाल चलने की वजह से इन्हे शनैश्चर भी कहा जाता है। शनि एक राशि में करीब ढाई वर्षों तक रहते हैं। इस तरह से पूरे 12 राशियों का एक चक्र पूरा करने में शनिदेव को करीब 30 वर्षो का समय लग जाता है। दरअसल ग्रहों की स्थितियों और योग के निर्माण से शनिदेव कष्ट न देकर जातक को शिखर तक पहुंचा देते हैं। आइए जानते हैं न्याय के कारक शनिदेव कब-कब शुभ फल देते हैं।  

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- शनिदेव को दो राशियों का स्वामी माना गया है-मकर और कुंभ। ऐसे में जब भी किसी जातक की कुंडली में शनिदेव की ये दोनों राशियां केंद्र में होकर भावधिपति की भूमिका में केंद्र (1,4,7 और 10), त्रिकोण(1,5,9) या लाभ स्थान में स्थिति हो तो जातक  पर शनिदेव की विशेष कृपा रहती है। ऐसे लोग तब अपने-अपने कार्यक्षेत्र में ऊंचाईयों को प्राप्त करते हैं जब शनि की महादशा, अंतर्दशा, शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या औ फिर योगिनी दशा आती है। 

- जब भी किसी जातक की कुंडली में शनिदेव योगकारक होकर पंचमहापुरुष राजयोग का निर्माण करते हैं तो जातक के लिए शनि कष्टकारक न होकर लाभदायक और अत्यंत शुभ फलदायी साबित होते हैं। पंचमहापुरुष राजयोग ज्योतिष शास्त्र में सबसे ज्यादा शुभ फल देने वाले योगों में शामिल है। जब शनि, मंगल, गुरु, बुध और शुक्र अपनी स्वराशि या फिर उच्च राशि में होकर केंद्र में स्थित होते हों तो पंचमहापुरुष राजयोग का निर्माण होता है। शनि के द्वारा कुंडली में बनने वाले राजयोग को शश पंचमहापुरुष राजयोग कहा जाता है।  

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- जब-जब जातक की कुंडली में शश पंचमहापुरुष राजयोग बनता है तो यह बहुत ही शुभ और लाभदायक साबित होता है। वहीं शनि कुंडली के लग्नेश होकर अगर केंद्र, त्रिकोण या फिर फिर एकादश भाव में विराजमान होते हैं तो शनि देव बहुत ही शुभ होते हैं। 
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