हिंदू धर्म में विवाह के समय कई प्रकार के विधि विधान किए जाते हैं। इनमें द्वार पर दूल्हे की आरती से लेकर कन्यादान और सिंदूरदान तक कई विधान होते हैं। शास्त्रों में कन्यादान को सभी प्रकार के दानों में उत्तम माना गया है।
कहते हैं इससे कई हजार गाएं दान करने का पुण्य प्राप्त होता है जो कई जन्मों के पाप को दूर करके परलोक में सुख प्रदान करता है। इसलिए विवाह के अंतिम चरण में पिता या घर का कोई वरिष्ठ व्यक्ति कन्यादान करता है।
हर विवाह में कन्यादान से पूर्व एक विधान और होता है जिसके बिना कन्यादान नहीं किया जाता है वह विधान है वर पूजा। वर की पूजा करने के बाद स्वर्ण अथवा कुछ धन के साथ कन्या का हाथ वर के हाथों में सौंप दिया जाता है।
सवाल उठता है कि विवाह के समय आखिर वर पूजा का कारण क्या है?