Puri Ratha Yatra 2025: भारत के चार प्रमुख धामों में से एक है जगन्नाथ पुरी। मान्यता है कि अन्य तीन धामों की यात्रा पूरी करने के बाद अंत में पुरी आना चाहिए। उड़ीसा राज्य के पुरी नगर में स्थित श्रीजगन्नाथ मंदिर वैष्णव संप्रदाय का एक प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है, जो भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है। इस स्थान को धरती का वैकुंठ कहा गया है। इसे शाकक्षेत्र, नीलांचल और नीलगिरि के नाम से भी जाना जाता है। अनेक पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने यहां नीलमाधव के रूप में अनेक लीलाएं कीं। यह पावन धाम भी द्वारका की तरह समुद्र तट पर स्थित है।
जग के नाथ अपने भाई-बहन संग विराजते हैं
पुरी में भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं। यहां की विशेषता यह है कि तीनों देवताओं की मूर्तियां काष्ठ (लकड़ी) से बनी होती हैं। प्रत्येक बारह वर्षों के अंतराल पर इन मूर्तियों को विशेष नियमों के अनुसार पवित्र नीम की लकड़ी से फिर से निर्मित किया जाता है। यह प्रक्रिया ‘नवकलेवर’कहलाती है। वैदिक दृष्टिकोण से भगवान बलराम ऋग्वेद, श्रीहरि सामवेद, सुभद्रा यजुर्वेद और सुदर्शन चक्र अथर्ववेद के प्रतीक माने जाते हैं। इस स्थान पर श्रीहरि दारुमय (लकड़ी के) स्वरूप में विराजते हैं।
किसने करवाया मंदिर का निर्माण
वर्तमान श्रीजगन्नाथ मंदिर का निर्माण कार्य कलिंग नरेश अनंतवर्मन चोडगंगदेव ने आरंभ कराया था। बाद में 1197 ई. में ओड़िया शासक अनंगभीमदेव ने इसे वर्तमान भव्य रूप प्रदान किया। मंदिर के गर्भगृह में तीनों देवताओं की मूर्तियां रत्नमंडित पाषाण चबूतरे पर प्रतिष्ठित हैं। मान्यता है कि इन मूर्तियों की पूजा मंदिर निर्माण से भी पूर्व से होती आ रही है।
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को आरंभ होती है रथ यात्रा
हर वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को विश्वविख्यात रथ यात्रा प्रारंभ होती है। रथ यात्रा के लिए नीम की लकड़ियों से तीन भव्य रथ बनाए जाते हैं। सबसे आगे बलराम जी का रथ 'तालध्वज' (लाल-हरा रंग), मध्य में सुभद्रा जी का रथ 'दर्पदलन' या 'पद्मरथ' (नीला-काला रंग) और पीछे जगन्नाथ जी का रथ 'नंदिघोष' या 'गरुड़ध्वज' (लाल-पीला रंग) होता है। जगन्नाथ जी का रथ 45.6 फीट, बलराम जी का 45 फीट और सुभद्रा जी का रथ 44.6 फीट ऊँचा होता है।
गुंडीचा मंदिर को कहते हैं मौसी का घर
रथ यात्रा श्री मंदिर से प्रारंभ होकर 3 कि.मी. दूर गुंडीचा मंदिर तक जाती है, जिसे भगवान की मौसी का घर माना गया है। एक अन्य मान्यता के अनुसार यही वह स्थान है जहां विश्वकर्मा ने इन प्रतिमाओं का निर्माण किया था, इसलिए इसे भगवान जगन्नाथ की जन्मस्थली भी माना जाता है। यहां तीनों देव सात दिनों तक विश्राम करते हैं। आषाढ़ शुक्ल दशमी को रथ पुनः मंदिर लौटते हैं, जिसे ‘बहुड़ा यात्रा’ कहा जाता है। वापस लौटने पर वैदिक मंत्रों के बीच देव विग्रहों की पुनः प्रतिष्ठा की जाती है।