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पितृपक्ष में खरीदारी और मांगलिक कार्य करना चाहिए या नहीं, जानिए शास्त्र-सम्मत सच्चाई

सार

पितृपक्ष को लेकर मान्यता है कि इस दौरान नई वस्तुएं खरीदना अशुभ होता है। लेकिन क्या शास्त्रों में वास्तव में ऐसा कोई प्रतिबंध बताया गया है? जानिए पितृपक्ष में खरीदारी, लेन-देन और मांगलिक कार्यों को लेकर क्या नियम हैं।
 
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पितृपक्ष में सोना-वाहन खरीदना शुभ या अशुभ? - फोटो : AI
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विस्तार
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पितृपक्ष को अशुभ मानकर नई वस्तुओं की खरीदारी न करना केवल एक सामाजिक भ्रम है। मत्स्य पुराण, गरुड़ पुराण और 'निर्णयसिंधु' जैसे प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार पितृपक्ष अत्यंत पवित्र समय है, जिसमें पितर अपनी संतान को सुखी व समृद्ध देखकर दीर्घायु और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

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1. शास्त्रों के अनुसार क्या वर्जित है और क्या नहीं?
क्या पूर्णतः वर्जित है (मांगलिक संस्कार): विवाह, मुंडन, गृह-प्रवेश, नामकरण और नए व्यवसाय का मुहूर्त। ये कार्य इसलिए वर्जित हैं क्योंकि यह समय केवल पितरों के तर्पण और ध्यान के लिए समर्पित है।
क्या वर्जित नहीं है (खरीदारी व लेन-देन): सोना, चांदी, वाहन, मकान या नए वस्त्र खरीदना। दैनिक या व्यावसायिक लेन-देन पर भी कोई प्रतिबंध नहीं है।

2. खरीदारी क्यों है शास्त्र-सम्मत?
वस्त्र व स्वर्ण दान का विधान: श्राद्ध ग्रंथों में पितरों एवं ब्राह्मणों को नए वस्त्र व सोना दान करने का स्पष्ट निर्देश है। जब दान के लिए खरीदारी शुभ है, तो स्वयं के प्रयोग के लिए भी यह वर्जित नहीं हो सकती।
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गणेश व देवी पूजा का संधि काल: यह 16 दिन का समय गणेश उत्सव और नवरात्रि के मध्य पड़ता है, अतः यह काल स्वतः ही शुभ और मंगलकारी है।

3. पितृपक्ष में खरीदारी के नियम
प्राथमिकता तर्पण को दें: पहले पितरों का तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन संपन्न करें, उसके बाद ही खरीदारी करें।
पितृ-अंश निकालें: अपने लिए खरीदी गई वस्तु या संपत्ति में से एक छोटा सा अंश पितरों के नाम से दान अवश्य करें।
दिखावे से बचें: अहंकार, विलासिता के प्रदर्शन या पितरों की उपेक्षा करके खरीदारी न करें।

- शैली प्रकाश

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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