पितृपक्ष को अशुभ मानकर नई वस्तुओं की खरीदारी न करना केवल एक सामाजिक भ्रम है। मत्स्य पुराण, गरुड़ पुराण और 'निर्णयसिंधु' जैसे प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार पितृपक्ष अत्यंत पवित्र समय है, जिसमें पितर अपनी संतान को सुखी व समृद्ध देखकर दीर्घायु और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
1. शास्त्रों के अनुसार क्या वर्जित है और क्या नहीं?
क्या पूर्णतः वर्जित है (मांगलिक संस्कार): विवाह, मुंडन, गृह-प्रवेश, नामकरण और नए व्यवसाय का मुहूर्त। ये कार्य इसलिए वर्जित हैं क्योंकि यह समय केवल पितरों के तर्पण और ध्यान के लिए समर्पित है।
क्या वर्जित नहीं है (खरीदारी व लेन-देन): सोना, चांदी, वाहन, मकान या नए वस्त्र खरीदना। दैनिक या व्यावसायिक लेन-देन पर भी कोई प्रतिबंध नहीं है।
2. खरीदारी क्यों है शास्त्र-सम्मत?
वस्त्र व स्वर्ण दान का विधान: श्राद्ध ग्रंथों में पितरों एवं ब्राह्मणों को नए वस्त्र व सोना दान करने का स्पष्ट निर्देश है। जब दान के लिए खरीदारी शुभ है, तो स्वयं के प्रयोग के लिए भी यह वर्जित नहीं हो सकती।
गणेश व देवी पूजा का संधि काल: यह 16 दिन का समय गणेश उत्सव और नवरात्रि के मध्य पड़ता है, अतः यह काल स्वतः ही शुभ और मंगलकारी है।
3. पितृपक्ष में खरीदारी के नियम
प्राथमिकता तर्पण को दें: पहले पितरों का तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन संपन्न करें, उसके बाद ही खरीदारी करें।
पितृ-अंश निकालें: अपने लिए खरीदी गई वस्तु या संपत्ति में से एक छोटा सा अंश पितरों के नाम से दान अवश्य करें।
दिखावे से बचें: अहंकार, विलासिता के प्रदर्शन या पितरों की उपेक्षा करके खरीदारी न करें।
- शैली प्रकाश
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