धर्मग्रंथों में कुश के बारे में विस्तार से बताया गया है।
- अथर्ववेद में कुश घास के उपयोग के बारे में बताया गया है कि यह क्रोध को नियंत्रित करने में सहायक होती है। कुश घास का प्रयोग एक औषधि के रूप में किया जाता है। भगवान विष्णु के रोम से बनी होने के कारण इसे बहुत पवित्र माना गया है।
- मत्स्य पुराण में कुश की उत्पत्ति के बारे में बताया गया है कि जब भगवान विष्णु ने वराह अवतार धारण कर हिरण्याक्ष नामक राक्षस का वध कर फिर से धरती को समुद्र से निकालकर सभी प्राणियों की रक्षा की थी। भगवान वराह अवतार ने जब अपने शरीर पर लगे पानी को झटका तब उनके शरीर के कुछ बाल पृथ्वी पर आकर गिरा और कुश का रूप धारण कर लिया। तभी से कुश को पवित्र माना जाने लगा।
- कुश के संबंध में महाभारत में एक प्रसंग है। एक बार जब गरुड़देव स्वर्ग से अमृत कलश लेकर आ रहे थे तब कुछ देर के लिए उन्होंने कलश को जमीन पर कुश घास पर रख दिया था। कुश पर अमृत कलश रखे जाने से तब से इसे बहुत ही पवित्र मानी जाने लगी।
- महाभारत में जब कर्ण ने अपने पितरों का तर्पण किया तब इसमें उन्होंने कुश का ही उपयोग किया था। तभी से यह मान्यता है कि कुश पहनकर जो भी अपने पितरों का श्राद्ध करता है उनसे पितरदेव तृप्त होते हैं।
- सभी तरह के धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-पाठ के दौरान कुश के आसन का प्रयोग करना बहुत ही शुभ माना जाता है।