फुलेरा दूज की व्रत कथा
सनातन परंपरा के अनुसार, एक समय ऐसा आया जब भगवान श्रीकृष्ण अपने कर्तव्यों में अत्यंत व्यस्त हो गए और कई दिनों तक वृंदावन नहीं आ सके। उनके बिना राधा रानी बहुत दुखी हो गईं। उनके मन में कृष्ण की याद लगातार तड़प पैदा कर रही थी। ब्रज की गोप-गोपिकाएं भी उनके वियोग में उदास रहने लगीं। यहाँ तक कि ब्रज की प्रकृति भी उनके विरह में व्याकुल हो गई। पेड़-पौधे मुरझाने लगे, लताओं ने फूल देना बंद कर दिया, कुंडों का जल घटने लगा और यमुना नदी भी मानो विरह में व्याकुल हो उठी।
जब देवर्षि नारद द्वारका पहुंचे, उन्होंने कृष्ण को ब्रजवासियों और गोपियों की व्यथा सुनाई। उन्होंने बताया कि आपके बिना ब्रज की रौनक समाप्त हो गई है, लोग दुखी हैं और प्रकृति भी शोक में डूबी हुई है। यह सुनकर भगवान श्रीकृष्ण का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने तुरंत ब्रज लौटने का निश्चय किया।
जैसे ही कृष्ण ब्रज लौटे, पूरे क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई। माता यशोदा दौड़ीं और हृदय से उन्हें गले लगाया। राधा रानी और गोपिकाएं भी कृष्ण को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुईं। उनके दर्शन मात्र से ही ब्रज की हरियाली वापस लौट आई। पेड़-पौधे हरे-भरे हो गए और लताओं पर फिर से फूल खिल गए। उसी समय कृष्ण ने राधा रानी के ऊपर फूलों की वर्षा करना शुरू किया। यह दिन ब्रजवासियों और गोपिकाओं के लिए अपार आनंद का कारण बन गया।
मान्यता है कि उस दिन फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि थी। श्रीकृष्ण द्वारा राधा रानी पर फूलों की वर्षा से ही ब्रज में फूलों की होली की परंपरा शुरू हुई। तभी से इस दिन को फुलेरा दूज कहा जाने लगा और ब्रज में होली का प्रारंभिक उत्सव इसी दिन मनाया जाता है।
फुलेरा दूज का दिन अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन विधि-विधान से पूजा और व्रत रखने से राधा-कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है, सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और कार्यों में सफलता मिलती है। इसे शीत ऋतु में विवाह के लिए अंतिम शुभ दिन भी माना जाता है, इसलिए अबूझ मुहूर्त में विवाह भी इस दिन किए जाते हैं।