आज नवरात्र की अष्टमी तिथि है। इस दिन मां की आठवीं विभूति गौरी की पूजा होती है। माता गौरी को शिवा, उमा और पार्वती के नाम से भी जाना जाता है। पार्वती पूर्व जन्म में दक्ष की पुत्री सती थी जिनका विवाह भगवान शिव से हुआ था। दक्ष द्वारा शिव का अपमान किये जाने के कारण माता सती ने दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में हवन कुण्ड में कूदकर आत्मदाह कर लिया।
सती का अगला जन्म हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में हुआ। पार्वती को पूर्व जन्म की सभी बातें याद थी। पार्वती ने भगवान शिव को पुनः पति रूप में पाने के लिए कई वर्षों तक कठोर तपस्या की। तप में लीन माता ने कंदमूल और पत्तों का आहार भी त्याग दिया। इस कठोर तप से माता पार्वती का शरीर काला पड़ गया। भगवान शिव माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न हुए और पार्वती को पत्नी रूप में स्वीकार कर लिया।
एक बार इंद्रलोक पर असुरों का राजा शुंभ और उसका छोटा भाई निशुंभ आक्रमण कर दिया। देवताओं को पराजित करके इन दोनों भाईयों ने स्वर्ग से देवताओं को भगा दिया। भगवान शिव यह जानते थे कि देवताओं को माता पार्वती ही कष्ट से मुक्ति प्रदान कर सकती हैं। इसलिए एक दिन शिव जी ने पार्वती पर व्यंग करते हुए कहा कि तुम काली हो। माता पार्वती को यह बात दिल पर लग गयी।
पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि आपने मुझे काली कहा है, मैं आपको गोरी होकर दिखाऊंगी। गौर वर्ण पाने के लिए माता पार्वती तप करने लगी। तप से भगवान शिव प्रसन्न हुए और पार्वती से कहा कि तुम गंगा स्नान करो, इससे तुम गौर वर्ण हो जाओगी और गौरी कहलाओगी। भगवान शिव की आज्ञा पाकर माता पार्वती गंगा में स्नान करने चली गयी।
पार्वती जब गंगा स्नान कर रही थीं उसी समय गंगा तट पर शुंभ-निशुंभ के कब्जे से स्वर्ग की पुनः प्राप्ति के लिए सभी देवता आदि शक्ति की आराधना कर रहे थे। माता पार्वती ने देवताओं की आराधना सुनकर कहा कि आप सब मेरी ही आराधना कर रहे हैं, आप निश्चिंत होकर जाएं शुंभ-निशुंभ का वध करके आप सभी देवताओं को कष्ट से मुक्ति दिलाउंगी।
गंगा स्नान के पश्चात माता पार्वती गौर वर्ण की हो गयी और उनके शरीर से श्यामल वर्ण कौशिकी प्रकट हुई। माता पार्वती की आज्ञा से देवी कौशिकी ने शुंभ-निशुंभ का वध कर दिया। शुंभ-निशुंभ के वध के बाद शिव ने पार्वती को समझाया कि काली कहकर व्यंग्य करने के पीछे उनका उद्देश्य कौशिकी का जन्म था। इस उद्देश्य के पूरा हुए बिना शुंभ-निशुंभ का वध संभव नहीं था।