पृथ्वी पर जो भी आया है वह कर्म के बंधन से बंधा हुआ है। कर्म करते हुए जाने-अनजाने कई बार हम पुण्य अर्जित कर लेते हैं तो पाप भी हमारे खाते में आ जाता है। पाप को दुःखों का कारण माना गया है। पाप के कारण ही मनुष्य जीवन-मृत्यु के चक्र में उलझा रहता है।
इस चक्र से छुटने के लिए जरूरी है कि पाप कर्म के बोझ से मुक्त हुआ जाए। इसके लिए शास्त्रों में आत्मशुद्धि के लिए यज्ञ, दान और व्रत जैसे कई विधान बनाए गये हैं। इन्हीं में से एक है एकादशी व्रत।
वर्ष की 24 एकादशियों में चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचिनी एकादशी कहा गया है। यह एकादशी इस वर्ष 6 अप्रैल को है। पुराणों में बताया गया है इस एकादशी के व्रत से जानकर या अनजाने में किये हुए सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है।
पापमोचिनी एकादशी कथा
इस एकादशी के संदर्भ में जो कथा मिलती है उसके अनुसार चैत्ररथ नामक बन में शिव को प्रसन्न करने के लिए शिव भक्त मेधावी ऋषि कठोर तप में लीन थे, उनके तप व पुण्यों के प्रभाव से देवराज इन्द्र घबरा गये। ऋषि की तपस्या भंग करने के लिए इन्द्र ने मंजुघोषा नामक अप्सरा को चैत्ररथ बन भेजा। मेधावी ऋषि अप्सरा के हाव-भाव को देखकर उस पर मुग्ध हो गए।
शिव भक्ति छोड़कर ऋषि मंजुघोषा के साथ रहने लगे। कई साल गुजर जाने पर मंजुघोषा ने ऋषि से स्वर्ग वापस जाने की आज्ञा मांगी। ऋषि को तब भक्ति मार्ग से हटने का बोध हुआ और अपने आप पर ग्लानि होने लगी। धर्म भ्रष्ट होने का कारण अप्सरा को मानकर ऋषि ने उसे पिशाचिनी हो जाने का शाप दिया।
अप्सरा इससे दुःखी हो गयी और शाप से मुक्ति के लिए प्रार्थना करने लगी। इसी समय देवर्षि नारद वहां आये और अप्सरा एवं ऋषि दोनों को पाप से मुक्ति के लिए पापमोचिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। नारद द्वारा बताये गये विधि-विधान से दोनों ने पाप मोचिनी एकादशी का व्रत किया जिससे वह पाप मुक्त हो गये।
शास्त्रों में बताया गया है कि एकादशी की इस कथा को पढ़ने और सुनने से सहस्र गौदान का फल मिलता है। ब्रह्महत्या, सोने की चोरी और सुरापान करनेवाले महापापी भी इस व्रत से पापमुक्त हो जाते हैं। यह व्रत बहुत पुण्यमय है।
व्रत का नियम
एकादशी के दिन प्रातः स्नानादि से निवृत होकर भगवान विष्णु की पूजा करें। घी का दीपक जलाकर भगवान से जाने-अनजाने जो भी पाप हुए हैं उससे मुक्ति पाने के लिए प्रार्थना करें। जितना अधिक संभव हो 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जप करें।
रात्रि जागरण करते हुए भजन करें तथा विष्णु भगवान के अवतारों की कथाओं और लीलाओं का पाठ करें। झूठ, लोभ, छल, कपट एवं काम भावना पर अंकुश रखें। व्रत करते हुए इस प्रकार की भावना मन में आने पर व्रत का लाभ नहीं मिल पता है।