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इन कारणों से मनुष्य मृत्यु के बाद प्रेतयोनी में जाकर कष्ट भोगता है

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शास्त्रों में बताया गया है कि सृष्टि में 84 लाख योनियां हैं इनमें कुत्ते, बिल्ली, कीड़े-मकोड़े और हम मनुष्य भी शामिल हैं। इतना ही नहीं मृत्यु के बाद लोक और परलोक के बीच में अटकी आत्माओं की भी योनियां शामिल हैं।
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लोक और परलोक के बीच जो आत्माएं ठहर जाती हैं वह भूत, प्रेतादि के रुप में भटकती रहती है और मुक्ति पाने तक विभिन्न प्रकार के कष्टो भोगती हैं।

गरुड़ पुराण, कठोपनिषद्, पद्मपुराण सहित कई अन्य पुराणों में इस बात का उल्लेख किया गया है कि मनुष्य किस कारण से प्रेम बनकर कष्ट भोगता है। यहां हम पद्मपुराण में बताई गई बातों का जिक्र कर रहे हैं।

क्या खाते हैं प्रेत

पद्मपुराण में पृथु नामक एक ब्राह्मण की कथा है। इस कथा में बताया गया है कि एक बार पृथु तीर्थयात्रा पर गए मार्ग में वह एक ऐसे स्थान पर पहुंचे जहां न तो दूर-दूर तक न तो जल था न वृक्ष बस थे तो कांटे ही कांटे।

ऐसे स्थान पर पृथु ने अचानक पांच भयानक आकृतियों को देखा। इन आकृतियों ने बताया कि वह प्रेत हैं। इन्होंने पृथु को बताया कि वह किन कारणों से प्रेत बना है और उनका भोजन क्या है। बाद में पृथु ने इनको प्रेत योनी से मुक्ति दिलाई।

पृथु के पूछने पर प्रेतों ने बताया कि हम प्रेत बड़े ही कष्ट में रहते हैं। हम केवल उन्हीं स्थानों में जा सकते हैं जहां गंदगी और अपवित्रता होती है। इसलिए हमारा भोजन भी गंदे पदार्थ हैं।
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ऐसे मनुष्य बनते हैं प्रेत

प्रेत और पृथु की बातों में यह प्रश्न उठा कि किस कर्म से मनुष्य प्रेत बनता है। इसका जवाब देते हुए पृथु बताते हैं कि जो मनुष्य परस्त्री अथवा पुरुष गमन करता है वह प्रेत योनी में जाता है। मांस और मदिरा सेवन को भी प्रेत योनी में पहुंचाने वाला बताया गया है।

किसी की अपमानत को हड़पने वाला और विश्वासघात करने वाला भी प्रेत योनी में जाता है। कमजोर और जरुरतमंदों के हक का अन्न खाने वाला भी प्रेत योनी को भोगता है। भूखे व्यक्ति को भोजन दिए बिना खुद भोजन करने वाला भी इस योनी में जाता है।
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