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जब नृसिंह भगवान करने लगे दुनिया का अंत

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भगवान विष्णु समय-समय पर धर्म और भक्तों की रक्षा के लिए अवतार लेते रहे हैं। शास्त्रों में इनके दशवतार बताये गये हैं। इनमें एक अवतार है नृसिंह अवतार, यह अवतार भगवान ने वैशाख शुक्ल चतुर्थी तिथि को धारण किया था। आज यही पुण्य तिथि है।
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यह अवतार भगवान ने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए धारण किया। इस अवतार में नृसिंह रूप में भगवान विष्णु ने हिरण्यकशिपु का वध किया। हिरण्यकशिपु का वध करने के बाद नृसिंह भगवान क्रोध से भर उठे। अपने भयंकर रूप से नृसिंह भगवान संसार का अंत करने के लिए तत्पर हो रहे थे।

इससे तीनों लोक भयभीत हो रहा था। सृष्टि की रक्षा के लिए जब देवतागण भगवान शिव के पास पहुंचे। शिव ने अपने अंश से उत्पन्न वीरभद्र से कहा कि नृसिंह क्रोध में भरकर संसार को नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें उनके वास्तविक स्वरूप का ज्ञान कराओ और उनसे निवेदन करो कि वह ऐसा न करें।
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अगर निवेदन से बात नहीं बने तो शक्ति का प्रयोग करके शांत करो। वीरभद्र नृसिंह के पास पहुंचे और पहले विनित भाव से शांत करने की कोशिश करने लगे। लेकिन जब नृसिंह नहीं माने तब वीरभद्र ने शरभ रूप धारण लिया। शरभ उपनिषद् में उल्लेख है कि नृसिंह को वश में करने के लिए वीरभद्र गरूड़, सिंह और मनुष्य का मिश्रित रूप धारण करके प्रकट हुए और शरभ कहलाये।

शरभ ने नृसिंह को अपने पंजे से उठा लिया और चोंच से वार करने लगा। शरभ के वार से आहत होकर नृसिंह ने अपना शरीर त्यागने का निर्णय लिया और शिव से निवेदन किया कि इनके चर्म को शिव अपने आसन के रूप में स्वीकार करें। इसके बाद नृसिंह भगवान विष्णु के तेज में मिल गये और शिव ने इनके चर्म को अपना आसन बना लिया।
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