आपने देखा या सुना होगा कि नाग देवता को लोग दूध चढ़ाते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि यह परंपरा कैसे और क्यों शुरू हुई। इस परंपरा के पीछे दो सौतनों की रोचक कथा है।
यह कैसी शर्त लगी सौतनों में?
कथा के अनुसार सागर मंथन के समय जब सफेद रंग का उच्चैश्रवा नाम का घोड़ा सागर से निकला तब कश्यप ऋषि की पत्नी और नाग माता कद्रू ने अपनी सौतन और गरूड़ की माता विनता से शर्त लगा बैठी की उच्चैश्रवा पूरी तरह सफेद नहीं है इसके कुछ बाल काले हैं।
विनता ने कहा ऐसा नहीं है उच्चैश्रवा पूरी तरह सफेद है। कद्रू ने कहा कि अगर उच्चैश्रवा के कुछ बाल काले दिखा दूं तो तुम मेरी दासी बनकर रहोगी।
कद्रू और विनता में शर्त लग जाने के बाद कद्रू ने अपने नाग पुत्रों को बुलाया और कहा कि तुम सभी जाकर उच्चैश्रव के शरीर से लिपट जाओ ताकि उच्चैश्रवा के शरीर के कुछ बाल काले नजर आने लगे। इस तरह मैं विनता से शर्त जीत जाऊंगी।
नागों को मिला यह कैसा शाप
कद्रू और विनता में शर्त लग जाने के बाद कद्रू ने अपने नाग पुत्रों को बुलाया और कहा कि तुम सभी जाकर उच्चैश्रव के शरीर से लिपट जाओ ताकि उच्चैश्रवा के शरीर के कुछ बाल काले नजर आने लगे। इस तरह मैं विनता से शर्त जीत जाऊंगी। लेकिन नागों ने माता की आज्ञा नहीं मानी। नागों ने कहा कि यह छल होगा।
अपने पुत्रों की बात सुनकर नागमाता कद्रू क्रोधित हो गई और अपने पुत्र नागों को शाप दे दिया कि पांडव वंश के राजा जनमेजय नाग यज्ञ करेंगे उसमें तुम सभी जलकर भष्म हो जाओगे। माता के शाप से दुःखी होकर नाग ब्रह्मा जी के पास पहुंचे।
और फिर शुरू हुई नागों को दूध अर्पित करने की परंपरा
ब्रह्मा जी ने कहा कि तुम लोग चिंता न करो आस्तिक ऋषि तुम सबों की रक्षा करेंगे। ब्रह्मा जी ने पंचमी तिथि के दिन नागों को रक्षा का वरदान दिया था और पंचमी के दिन ही आस्तिक ऋषि ने नागों की रक्षा की थी इसलिए नागों को पंचमी तिथि प्रिय है।
माता के शाप के कारण हवन कुंड की आग से नाग जलने लग गए थे। इस समय आस्तिक मुनि ने नागों की रक्षा की और गाय के दूध से नागों को स्नान कराया। इससे नागों की तपन दूर हुई।
उस समय से ही नागों को दूध से स्नान करने की परंपरा शुरू हो गई जिसे आज भी लोग निभा रहे हैं। मान्यता है पंचमी के दिन जो व्यक्ति नाग को दूध से स्नान करवाता है उस पर नाग प्रसन्न होते हैं। ऐसे व्यक्ति के घर में नाग का भय नहीं रहता है।
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