प्रकृति का नियम है कि महिलाएं महीने में चार दिन ऋतु चक्र से प्रभावित होती है। इसे मासिक धर्म के नाम से जाना जाता है।
इन चार दिनों में महिलाओं को अपवित्र और अशुद्ध माना जाता है। भविष्योत्तर पुराण के हेमाद्री कांड में ऋषिपंचमी नामक व्रत की कथा का उल्लेख किया गया है।
इस कथा में बताया गया है कि सुमित्र नाम का एक ब्राह्मण था उसकी पत्नी का नाम जयश्री था।
जयश्री वेदों में बताये गये मासिक धर्म के नियमों का पालन नहीं करती थी। मासिक के समय भी यह स्वयं भोजन बनाती और पति को भोजन करवाती।
इससे अगले जन्म में जयश्री को कुतिया और ब्राह्मण को बैल के रूप में जन्म लेना पड़ा। शास्त्र और पुराण में मासिक धर्म को अशुद्ध समय माना गया है। इस समय महिलाओं को घर के कामकाज एवं पूजा-पाठ करने से मना किया गया है।
इस कारण से महिलाओं को आज भी मासिक धर्म के समय धार्मिक कार्यों में भाग लेने की मनाही रहती है। मासिक धर्म के विषय में यह मान्यता है कि इस दौरान स्त्री अचार को छू ले तो अचार सड़ जाता है। पौधों में पानी दे तो पौधे सूख जाते हैं।
इसलिए कई परिवार एवं समाज में मासिक धर्म के समय महिलाओं को घरेलू कार्यों से दूर रखा जाता है।
महिलाएं घर के किसी भाग में सबसे अलग रहती हैं और जमीन पर चटाई बिछाकर सोती हैं। इस कारण मासिक धर्म महिलाओं के लिए दंड का समय बन जाता है।
प्राचीन काल में तो इन्हें कोप भवन में रहना पड़ता था जहां न सूर्य की रोशनी पहुंचती थी और न खुली हवा होती थी।
क्या है वैज्ञानिक मत
वैज्ञानिक मत के अनुसार इस समय महिलाओं को संक्रमण का अधिक खतरा रहता है। यही कारण है कि अन्य लोगों को इसके बुरे प्रभाव एवं महिलाओं को संक्रमण से बचाने के लिए उन्हें घर के कामकाज से अलग रखकर आराम करने की बात कही गयी होगी। इस बात की संभावना है कि यह धारण समय के साथ विकृत हुई होगी।
प्राचीन काल में डिस्पोजेबल सेनेट्री पैड की सुविधा नहीं थी। महिलाएं कपड़ा इस्तेमाल करती थीं। जिससे संक्रमण की आशंका बहुत अधिक रहती थी लेकिन आज ऐसा नहीं है।
इसलिए यह मान्यता धीरे-धीरे कमज़ोर होती जा रही है और अब तो इसे हैप्पी पीरियड्स भी कहा जाने लगा है।
उल्लेखनीय है कि मासिक समाप्त होने के बाद के कुछ दिन गर्भ धारण के लिए उत्तम होते हैं। शास्त्रों के अनुसार मासिक के पहले सप्ताह में गर्भ धारण से आना वाला शिशु दीर्घायु होता है।