फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

धर्म: संस्कारों से अलग होने की मुश्किलें

Sat, 15 Sep 2018 10:21 AM IST
धर्मपाल
विज्ञापन
विज्ञापन

यदि यह सच है कि इस देश के साधारण लोग अपनी पौराणिक कल्पना के कलियुग में ही रह रहे हैं, तो इसी कलियुग को समझने की कोशिश करनी पड़ेगी। बीसवीं सदी का राग अलापते रहने से हमारा काम नहीं चल पाएगा। हमारे लोग इस सदी में नहीं हैं, तो यह अपनी सदी है ही नहीं। वैसे भी यह पश्चिम की ही सदी है। क्योंकि, हम यूरोप, अमेरिका या जापान के साथ अपने संपर्क को तोड़ नहीं सकते, इसलिए उनकी इस बीसवीं सदी को भी समझना पड़ेगा। हो सकता है कि कुछ लोग मानते हों कि वे पूरी तरह अपने संस्कारों और स्वभाव से मुक्त हो चुके हैं। भारतीयता को लांघकर वे आधुनिकता या शायद किसी तरह की आदर्श मानवता से एकात्म हो गए हैं। ऐसे कोई लोग हैं, तो उनके लिए बीसवीं सदी की दृष्टि से कलियुग को समझना और भारतीय कलियुग को पश्चिम की बीसवीं सदी के रूप में ढालने के उपायों पर विचार करना संभव होता होगा। पर ऐसा अक्सर होता नहीं है। 

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें