यदि यह सच है कि इस देश के साधारण लोग अपनी पौराणिक कल्पना के कलियुग में ही रह रहे हैं, तो इसी कलियुग को समझने की कोशिश करनी पड़ेगी। बीसवीं सदी का राग अलापते रहने से हमारा काम नहीं चल पाएगा। हमारे लोग इस सदी में नहीं हैं, तो यह अपनी सदी है ही नहीं। वैसे भी यह पश्चिम की ही सदी है। क्योंकि, हम यूरोप, अमेरिका या जापान के साथ अपने संपर्क को तोड़ नहीं सकते, इसलिए उनकी इस बीसवीं सदी को भी समझना पड़ेगा। हो सकता है कि कुछ लोग मानते हों कि वे पूरी तरह अपने संस्कारों और स्वभाव से मुक्त हो चुके हैं। भारतीयता को लांघकर वे आधुनिकता या शायद किसी तरह की आदर्श मानवता से एकात्म हो गए हैं। ऐसे कोई लोग हैं, तो उनके लिए बीसवीं सदी की दृष्टि से कलियुग को समझना और भारतीय कलियुग को पश्चिम की बीसवीं सदी के रूप में ढालने के उपायों पर विचार करना संभव होता होगा। पर ऐसा अक्सर होता नहीं है।