पर्युषण या दशलक्षण पर्व दिगंबर परंपरा में समूचे समाज का अनुष्ठान पर्व है। इसका प्रारंभिक दिन भाद्रपद शुक्ल पंचमी और समापन का दिन चतुर्दशी है। श्वेतांबर जैन परंपरा में भाद्रपद शुक्ल पंचमी को समाधि या संवत्सरीन का दिन होता है। पूर्ण त्याग- प्रत्याख्यान, उपवास, पौषध सामायिक, स्वाध्याय और संयम से मनाया जाता है। पर्व के संबंध में अलग-अलग मान्यताएं। इसे संवत्सरी चातुर्मास के 49 या 50 दिन बीतने पर मनाया जाना चाहिए।
दिगंबर परंपरा में पर्युषण पर्व 10 लक्षण समाप्त होते ही शुरू होता है। पर्युषण आठ दिन तक मनाया जाता है। जिस व्यक्ति में कोई ताप, उत्ताप, द्वेष भावना आ गई हो, उसे शांत करने का पर्व है यह। दोहराया जाता है, “संपिक्खए अप्पगमप्पएणं” अर्थात आत्मा से आत्मा को देखो। उद्घोष इस बात का सूचक है कि आत्मा में बहुत सार है, उसे देखो और किसी माध्यम से नहीं, केवल आत्मा के माध्यम से देखो। पर्युषण का अर्थ है- आत्मा में अवस्थित होना। पर्व का केंद्रीय तत्व ही है- आत्मा। आत्मा के निरामय, ज्योतिर्मय स्वरूप को प्रकट करने में इसकी खास भूमिका है। सिद्ध होने या उसके रास्ते चल निकलने पर मन की गुत्थियां खुल जाती हैं।
महावीर ने क्षमा अर्थात समता का जीवन जिया। महान व्यक्ति ही क्षमा ले एवं दे सकते हैं। पर्युषण क्षमा के आदान-प्रदान का पर्व है। इस दिन सभी मन की गांठों को खोलते हैं, एक दूसरे से गले मिलते हैं, हुई भूलों को क्षमा से समाप्त कर जीवन को पवित्र बनाते हैं। पर्युषण महापर्व का समापन मैत्री दिवस के रूप में आयोजित होता है, जिसे क्षमापना दिवस भी कहा जाता है। पर्युषण पर्व एक दूसरे को करीब आने और समझने के साथ ही सदभाव बढ़ाने का पर्व है। इसमें पाथेय है, मार्ग दर्शन है और अहिंसक जीवन शैली का प्रयोग भी।