भगवान गणेश जी पिछले एक हफ्ते से पृथ्वी पर मौजूद हैं और लोग गणपति को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा अर्चना कर रहे हैं। बस एक दिन बाद यानी 8 तारीख को गणेश जी अपने लोक लौट जाएंगे और गणपति के भक्त अगले एक साल तक इनके वापस आने की प्रतीक्षा करेंगे। ऐसा माना जाता है कि जिस रुप में आज गणेश उत्सव मनाया जाता है उसकी शुरुआत करने वाले लोकमान्य तिलक हैं।
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इन्होंने गणपति को पूजा-पाठ और कर्मकांड से बाहर निकाल कर राष्ट्रीय एकता और जागरण का प्रतीक बना दिया। हालांकि यह उत्सव पहले से प्रचलित था पर 1893 में तिलक ने सभी धर्मो व संप्रदाय के लोगों को एकजुट कर, अन्याय के खिलाफ उठाने और सामाजिक सास्कृतिक जागृति लाने का एक बड़ा जरिया बनाया।
उत्सव में सभी धर्मों के लोगों की भागीदारी होती है। दस दिन के उत्सव में आखिरी दिन अनंत चतुर्दशी (इस बार 8 सितंबर) को मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। गणपति की विदाई का उत्सव गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ के उद्घोष से संपन्न होता है।
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गणेशजी के जन्म को लेकर अनेक मत हैं लेकिन वह तिथि चतुर्थी ही थी, इस पर कोई विवाद नहीं है। दस दिन के उत्सव में अंनत चतुर्दशी का दिन समापन के लिए विख्यात है। चूंकि मौजूदा रूप में उत्सव का प्रचलन महाराष्ट्र लोकमान्य तिलक द्वारा हुआ, इसलिए लोकप्रियता का केंद्र भी यही इलाका है। हालांकि अब देश भर में इसे मनाया जा रहा है।
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