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Maha Kumbh 2025: कुंभ महोत्सव एक वैदिक, ऐतिहासिक और सामाजिक व्यापकता

Sun, 26 Jan 2025 11:12 AM IST
श्वेता सिंह आचार्य श्री शुभेष शर्मन, श्री राम शक्ति पीठ दिल्ली राष्ट्रीय प्रमुख (धर्म समाज)

सार

Maha Kumbh Mahotsav: यही कुंभ महोत्सव की प्रामाणिक पौराणिकता भी है।  विशेषत: कुंभ पर्व आदि काल से ही है  हम जो चर्चा कर रहे वह सर्व ब्रह्मांड में व्यापक अमृत कुंभ की चर्चा और चिंतन कर रहे हैं।
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महाकुंभ 2025 - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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कुंभ के सन्दर्भ में जब चिंतन करते हैं तो वरुण कलश की चर्चा महत्वपूर्ण है क्योंकि कुंभ महोत्सव तो आदि अनादि है क्योंकि वरुण देव भी आदि अनादि हैं।  

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कलशे मुखे विष्णु कंठ रुद्र समासित मुले तत् वशत ब्रह्मा मध्य मात्र गण स्थितित् 

उपरोक्त मंत्र से भी सब स्पष्ट हो जाता है कि कुंभ में वरुण देव सहित सभी देव विराज मान है। यही कुंभ महोत्सव की प्रामाणिक पौराणिकता भी है। विशेषत: कुंभ पर्व आदि काल से ही है हम जो चर्चा कर रहे वह सर्व ब्रह्मांड में व्यापक अमृत कुंभ की चर्चा और चिंतन कर रहे हैं।

सागर मंथन में अमृत कुंभ के साथ भगवान धन्वंतरि जब निकले तो पूर्व नियोजित योजना के अनुरूप जयंत (इंद्रपुत्र )अमृत कलश को छीनकर आकाश में उड़ गय। वहीं  दूसरी ओर दैत्य गुरु शुक्राचार्य की आज्ञा से दैत्यों ने अमृत कुंभ छीन लिया। देवों और दैत्यों में द्वादश(12) दिवस तक युद्ध होता रहा। इसी संघर्ष में पृथ्वी के चार भागों में प्रयाग हरिद्वार उज्जैन नासिक पर अमृत कुंभ से अमृत बिंदु गिरा। उस विषम परिस्थिति में सूर्य चंद्र देव गुरु बृहस्पति ने अमृत कलश की रक्षा की।  

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महाकुंभ महोत्सव - फोटो : पीटीआई
देवानां द्वादशभिर्मासैर्मर्त्यैः द्वादशवत्सरैः।
जायन्ते कुंभपर्वाणि तथा द्वादश संख्यया॥

अर्थात मनुष्यों के बारह वर्षों के द्वारा, देवताओं के बारह दिन सम्पन्न होते हैं, इसलिये 12-12 वर्षों के अन्तराल पर कुंभ पर्व होते हैं। एवं जिस दिन अमृत-कुंभ गिरने वाली राशि पर सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति का संयोग हो, उस समय पृथ्वी पर कुंभ होता है । 

काल गणना के अनुसार देवों के द्वादश दिन मनुष्यों पृथ्वी लोक में द्वादश वर्ष समतुल्य होते हैं। अतः कुंभ भी 12 होते हैं जिसमें चार पृथ्वी पर 8 देव लोक में  जिन्हें देव ही प्राप्त करते हैं। जिस काल खंड संयोग में सूर्य चंद्र देव गुरु बृहस्पति ने अमृत कलश की रक्षा की वही सुयोग गणना भू पृष्ठ पर अर्थात पृथ्वी पर कुंभ पर्व का समय होता है। अर्थात जिस समय विशेष रूप में सूर्य चंद्र देव गुरु बृहस्पति का संयोग होता उसी उस वर्ष राशि विशेष अवस्था के अनुसार जहां अमृत कुंभ से सुधाबिंदु गिरा वहीं कुंभ पर्व होता है।  

महाकुंभ महोत्सव - फोटो : Adobe Stock
मकरे च दिवानाथे वृषराशिस्थिते गुरौ। प्रयागे कुंभयोगो वै माघमासे विधुक्षये॥
मेषराशिगते जीवे मकरे चन्द्रभास्करौ। अमावस्यां तदा योगः कुम्भाख्यस्तीर्थनायके॥
अर्थात  मकर में सूर्य, वृष राशि में गुरु के होने पर प्रयाग में माघ-अमावस्या को कुम्भ योग होता है। 
जिस समय बृहस्पति मेष राशि पर स्थित हो तथा चन्द्रमा और सूर्य मकर राशि पर हो तो उस समय तीर्थराज प्रयाग में कुम्भ-योग होता है। अर्थात निरयन गति से गमन करते हुए सूर्य जब मकर राशि में गुरु वृष राशि में होंगे, तब माघ अमावस्या को तीर्थराज प्रयाग में श्री गंगा जी के तट पर कुंभ योग का सुयोग बनता है।  

महाकुंभ महोत्सव - फोटो : Adobe Stock
 माघ कृष्णा प्रतिपदा 14 जनवरी 2025 से यह कुंभ महापर्व का सुयोग बना है। उज्जैन में जिस समय मेष राशि में सूर्यदेव हो देव गुरु बृहस्पति सिंह राशि में हो उस समय कुंभ का सुयोग उज्जैन में होता है।  जिस समय सूर्यदेव देव गुरु बृहस्पति दोनों सिंह राशि में हो तो नासिक में कुंभ का सुयोग बनता है।  
गंगाद्वारे प्रयागे च धारा-गोदावरीतटे।
कुंभाख्येयस्तु योगोऽयं प्रोच्यते शंकरादिभिः॥ 
अर्थात गंगाद्वार, प्रयाग, धारानगरी और गोदावरी में शंकरादि देवगण ने कुंभयोग कहा है।
 कुंभ पर्व बारह-बारह वर्ष के अंतरालमें नदियों के समीप चार मुख्य तीर्थों में खगोलीय-ग्रहस्थिति प्राप्त होने पर लगनेवाला स्नान-दान आदि का पर्व है।
 

महाकुंभ महोत्सव - फोटो : Adobe Stock
पौराणिक चिंतन के साथ ऐतिहासिक दृष्टि से विचार करें तो हर्ष वर्धन कन्नौज के राजा थे। प्रयाग कुंभ महोत्सव के आयोजन में उनकी भी विशेष भूमिका रही थी।  लगभग चौदह सौ वर्ष पूर्व में एक चीनी यात्री भारत आए थे उन्होंने अपनी पुस्तक शी यू की में कुंभ महोत्सव का वर्णन किया है।  

ह्वेनसांग 630 से 645 ईस्वी में भारत में थे जो हर्ष वर्धन के राज्य में उनके मित्र की तरह एक दशक वर्ष से भी अधिक समय तक रहे।  एक अन्य प्रमाण के अनुसार ह्वेनसांग ने छठे महामोक्ष परिषद प्रयाग कुंभ में भाग लिया था। ह्वेनसांग ने तत्कालिक भारतीय आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक और शासन प्रणाली पर भी अपना पक्ष अपनी पुस्तक में भारत यात्रा का वृतांत लिखा है। शी यू की में कुंभ का ऐतिहासिक प्रमाण लिखित साक्ष्य है। 

महाकुंभ महोत्सव - फोटो : अमर उजाला
पूर्वकाल में भी कुंभ के पर्व पर विदेशी यात्रियों का आना शताब्दियों से रहा जो आज भी अनवरत जारी है। अनेक देशों के यात्री आज भी कुंभ महापर्व में पधारे हैं। एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण भगवान आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म की पुनर्स्थापना के स्वरूप अखाड़ों की स्थापना की जो पूर्ण रूप से धर्म रक्षा हित शस्त्र शास्त्र निपुण संन्यासियों का संगठन है। भगवान आदि शंकराचार्य जी ने आदर्श रूप में समस्त सम्प्रदायों को एक रूप में स्थापित कर साधु महात्मा महापुरषों के माध्यम से लोक कल्याण हित सनातन धर्म के प्रसार ओर अनुपालन हेतु अखाड़ों की स्थापना का महत्वपूर्ण कार्य किया। 

महाकुंभ महोत्सव - फोटो : सोशल मीडिया
आज भी भारतीय संत महापुरुषों अखाड़े के आचार्यों द्वारा पूर्ण रूप से अनुपालित है। भगवान आदि शंकराचार्य जी के काल खंड गणना में इतिहास के खंड में दो विचार हैं। लगभग पच्चीस सौ वर्ष का काल खंड ही प्रमाणित दिखाई देता है।  इसलिए भगवान आदि शंकराचार्य जी द्वारा अखाड़ों की स्थापना की परम्परा से ही प्रमाणित रूप से प्रयाग आदि कुंभ महोत्सव का प्रामाणिक साक्ष्य भी है। इसका पालन सभी सनातन धर्मावलंबी सहज समर्पित भाव से करते हैं और बड़ी प्रसन्नता से पौराणिक ऐतिहासिक गौरवशाली परम्परा का पालन करते हैं।  

महाकुंभ महोत्सव - फोटो : अमर उजाला
आज 2025 के संदर्भ में देव गुरु बृहस्पति वृष राशि में सूर्य देव मकर राशि में होने पर प्रयाग में कुंभ सुयोग बना है। साथ ही 144वर्ष की काल गणना के अनुसार महाकुंभ अमृत महामहोत्सव के रूप में प्रत्यक्ष अनुभूत दृश्य है। इस संदर्भ में गोस्वामी जी ने लिखा है- 
मास मकर गति रवि जस होई 
तीरथ पति आवे सब कोई 
आज भी देव गुरु बृहस्पति आरूढ़ अवस्था में है,  अतिचारी भी हैं। यहां अतिचारी का अर्थ यह है कि अपनी निर्धारित गति से कई गुना अधिक तेज चलना एक अन्य विचार से लोक कल्याण  महत्वपूर्ण कार्य हेतु दैत्य गुरु शुक्राचार्य की राशि अर्थात उनके गृह में जाना। पश्चात्य चंद्रमा के द्वारा अपने ही पुत्रवत बुध की राशि में भी गमन करते हुए चंद्र देव की स्व राशि ओर अपनी उच्च राशि की नक्षत्र यात्रा पर हैं। 

महाकुंभ महोत्सव - फोटो : अमर उजाला।
अमृत कुंभ महामहोत्सव से ठीक एक वर्ष पूर्व चिरप्रतीक्षित भगवान श्रीराम लला के भव्य दिव्य मंदिर का निर्माण ओर भगवान की प्रतिष्ठान का होना देवगुरु बृहस्पति की आरूढ़ यात्रा का ही ज्योतिषीय फलित है। एक ओर पक्ष पर विचार करें आज कुंभ अमृत महोत्सव ने हमारे युवा पीढ़ी का जिज्ञासा के रूप में भारतीय संस्कृति के दर्शन को जानने के प्रति उत्साहित होना बुध ग्रह का फलित है। अनेक देशों से यात्रियों का आना भी देव गुरु बृहस्पति का वृष राशि संचार एक महत्वपूर्ण कारण है और सभी सम्प्रदायों समाज के सभी वर्गों का एक साथ बिना स्पर्शास्पर्श भाव के साथ एकत्र होकर स्नान करना पूर्णवरूप से चंद्र ग्रह का विशेष प्रभाव है। सभी प्रकार से बाल, किशोर,  युवा, प्रौढ़, वृद्ध स्त्री-पुरुषों का सामान भाव से पवित्र अमृत कुंभ महामहोत्सव में स्नान सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश का ही फल है। 

माघ मास में प्रत्येक वर्ष कल्प वासियों के तपस्वी पुण्यार्जन जीवन का दर्शन भी इसका ही प्रतीक है। सभी प्रकार से सनातन धर्म के प्रति उत्साहित होकर समर्पण भाव से भारत में प्रयाग कुंभ अमृत महोत्सव का चिंतन श्रवण मनन दर्शन विश्व के सवार्धिक वृहत मेला पर्व पर देव, ऋषि, साधक, आराधक, उपासक मानव महोत्सव का दर्शन ही भारतीय सनातन धर्म के व्यापक चिंतन का प्रत्यक्ष दृश्य रूप है।  इस प्रकार अमृत कुंभ महामहोत्सव को देखने सुनने प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष दर्शन का भी अनंत गुना  पुण्यदाई है। 

महाकुंभ महोत्सव - फोटो : संवाद
आदि शंकराचार्य ने जिस प्रकार अखाड़ों की स्थापना स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई में लाखों नागा साधु महात्मा महापुरषों ने मुगलों सहित अंग्रेजों के साथ भी संघर्ष किया। कुंभ पर्व पर नीति सनातन चर्चा के साथ निर्धारण का कार्य होता था। आनंद मठ द्वारा वंदे मातरम का उद्घोष कुंभ पर्व पर भी होता रहा और अत्यंत महत्वपूर्ण अमर सेनानी चंद्रशेखर आजाद का बलिदान भी प्रयाग की पुण्यभूमि में हुआ। यह भूमि वैदिक पौराणिक ऐतिहासिक सामाजिक राष्ट्रीय एकता का प्रत्यक्ष दर्शन है।  कुंभ महामहोत्सव पर विभिन्न  तीर्थों होने वाले विशेष पर्व तिथियां इस प्रकार है-
स्थान
ग्रह स्थिति विशेष महत्व
प्रयागराज बृहस्पति और सूर्य मकर राशि में त्रिवेणी संगम पर स्नानादि
हरिद्वार सूर्य और बृहस्पति कुंभ राशि में गंगा स्नानादि हरिद्वार में
उज्जैन सिंहस्थ योग क्षिप्रा नदी का महत्व
नासिक बृहस्पति और सूर्य सिंह राशि में गोदावरी नदी का महत्व

 
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महाकुंभ महोत्सव - फोटो : अमर उजाला।
सहस्त्रं कार्तिक स्नान माघे स्नान शततानी च
वैशाखे नर्मदा कोटि कुंभ स्नान तत् फ़लम 
अर्थात  कार्तिक में एक हजार गंगा स्नान,माघ में सौ बार, वैशाख में करोड़ बार का फल, कुंभ में एक बार स्नान से वही पुण्य फल प्राप्त होता है।  

दान फल 
ताम्र कलश में शहद भरकर, रजत कलश में दूध भरकर, स्वर्ण कलश में घृत भरकर दान करें, मिट्टी कलश में गंगा जल भर कर दान करें। ऐसा करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और पितृदोष दूर हो जाते हैं। इस लोक में पुत्र पौत्र संतति के प्राप्ति के साथ ही वैकुंठ आदि लोक को प्राप्त करता है। 

आचार्य श्री शुभेष शर्मन
श्री राम शक्ति पीठ दिल्ली राष्ट्रीय प्रमुख (धर्म समाज)
 अखिल भारतीय संत समिति

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): 
ये लेखक के निजी विचार हैं। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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