माघ माह के बारे में कहते हैं कि इन दिनों देवता पृथ्वी पर आते हैं। प्रयाग में स्नान-दान आदि करते हैं। सूर्य मकर राशि में आ जाता है। देवता मनुष्य रूप धारण करके भजन-सत्संग आदि करते हैं। माघ पूर्णिमा के दिन सभी देवी-देवता अंतिम बार स्नान करके अपने लोकों को प्रस्थान करते हैं। नतीजतन इसी दिन से संगम तट पर गंगा, यमुना एवं सरस्वती की जलराशियों का स्तर कम होने लगता है।
मान्यता है कि इस दिन अनेकों तीर्थ, नदी समुद्र आदि में प्रातः स्नान, सूर्य अर्घ्य, जप-तप दान आदि से सभी दैहिक, दैविक एवं भौतिक तापों से मुक्ति मिल जाती है । शास्त्र कहते हैं कि यदि माघ पूर्णिमा के दिन पुष्य नक्षत्र हो तो इस दिन का पुण्य अक्षुण हो जाता है।
यह अच्छा संयोग है कि इसबार माघ पूर्णिमा को पूरे दिन पुष्य नक्षत्र रहेगा। इस दिन सुवर्ण, तिल, कम्बल, पुस्तकें, पंचांग, कपास के वस्त्र और अन्नादि दान करने से सुकृत्य मिलता है।
शास्त्रों में प्रसंग है कि भरत ने कौशल्या से कहा कि यदि राम को वन भेजे जाने में उनकी किंचितमात्र भी सम्मति रही हो तो बैशाख, कार्तिक और माघ पूर्णिमा के स्नान सुख से वो वंचित रहें। उन्हें निम्न गति प्राप्त हो। यह सुनते ही कौशल्या ने भरत को गले लगा लिया। इससे इन अक्षुण पुण्यदायक पर्व का लाभ उठाने का महत्व पता चलता है।