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कुंभ 2019: 450 साल बाद मिला है मौका, संगम स्नान के बाद करना न भूलें इस दिव्य तीर्थ के दर्शन

Sat, 12 Jan 2019 03:49 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
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दिव्य कुंभ, भव्य कुंभ का शुभारंभ होने में बस कुछ ही दिन शेष है। 15 जनवरी मकर संक्रांति से कुंभ स्नान का महापर्व आरम्भ हो जाएगा। जहां पर देश-विदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु प्रयागराज की पावन धरती पर एकत्र होना प्रारंभ हो गया है। कुंभ मेले के सबसे बड़े आर्कषण नागा साधुओं का जत्था प्रयागराज में डेरा जमा चुके हैं। प्रयागराज में जितना महत्व तीन नदियों के संगम का है उतना ही महत्व संगम स्नान के बाद संगम तट पर किले के पास स्थित अक्षयवट का भी है। यह दिव्य वृक्ष अक्षयवट सैकड़ों वर्षों से आम नागरिको के लिए बंद था। 

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कुंभ से पहले कुछ दिन पहले प्रयागराज पहुंचे पीएम नरेन्द्र मोदी ने देश के करोड़ों सनातनधर्मियों की श्रद्धा भावना से जुड़े अक्षयवट तीर्थ को आम जनता के दर्शन के लिए खोलने का एलान किया। अक्षयवट सुरक्षा कारणों से लंबे समय से अकबर के किले में बंद था और साधु-संतों के अलावा श्रद्धालु इसके दर्शन-पूजन से वंचित थे।

प्रलय में भी नहीं नष्ट होता अक्षयवट

akshaya vat
प्रयागराज में संगम तट पर स्थित अकबर के किले के अंदर पौराणिक अक्षयवट वृक्ष का संबंध सृष्टि की रचना से जुड़ा माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पृथ्वी पर प्रलय के दौरान जब सब कुछ जलमग्न हो जाता है, उस दौरान अक्षय वट वृक्ष को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है। कहते हैं कि इसी अक्षय वट के एक पत्ते पर भगवान विष्णु बालरूप में विद्यमान रहकर सृष्टि के अनादि रहस्य का अवलोकन करते हैं। 

मनोरथ और मोक्षदायक वृक्ष

कुंभ मेला
अक्षय शब्द का अर्थ ही होता है, जिसका कभी क्षय ना हो। जबकि वट का अर्थ होता है बरगद। इसे मनोरथ और मोक्षदायक वृक्ष भी कहा गया है। मान्यता है कि सृष्टि की रचना को सुरक्षित रखने के लिए भगवान ब्रह्मा जी ने किले के प्रांगण में स्थित पातालपुरी मंदिर में बहुत बड़ा यज्ञ किया था। इस यज्ञ में पुरोहित के रूप में भगवान विष्णु, यजमान के रूप में भगवान शिव शामिल हुए थे। यज्ञ के पश्चात् इन तीनों देवताओं की शक्ति पुंज से एक वृक्ष उत्पन्न हुआ, जिसे अक्षय वट कहते हैं।

 

चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इस वृक्ष का जिक्र किया

कुंभ मेला 2019
संगम तट पर स्थित इस अक्षय वट वृक्ष के बारे में सबसे पहले चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 644 ई में वर्णन किया है। पौराणिक व वर्तमान इतिहासकारों के अनुसार एक समय किले में स्थित इसी वट वृक्ष जिसे अक्षयवट कहा जाता है, पर चढ़कर मोक्ष की कामना व पाप से मुक्ति के लिए यमुना नदी में कूद कर आत्महत्या करते थे।

भारतीय सेना के कब्जे में है अक्षय वट का प्रांगण

- फोटो : अमर उजाला
जिस परंपरा पर अकबर ने बाद में रोक लगा दी थी।बहरहाल, मोदी सरकार द्वारा आम जनता के लिए अक्षय वट के दर्शन की इजाजत मिलने के बाद अब असली-नकली अक्षय वट को लेकर सवाल पैदा हो गया है। कुछ लोग किले के भीतर सेना के अधीन वट वृक्ष को ही असली अक्षय वट मानते हैं, जबकि कुछ का मानना है कि पातालपुरी मंदिर स्थित वट वृक्ष की शाखा ही असली अक्षयवट है, जिसके दर्शन अभी तक वे करते आए हैं।
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कई बार अक्षय वट को जलाया और काटा गया

पीएम मोदी अक्षयवट के दर्शन करते हुए - फोटो : अमर उजाला
मुगल शासन के दौरान अक्षयवट को नष्य  करने की काफी कोशिशे की थी। अक्षयवट को 23 बार काटा  और  जलाया गया लेकिन उसके कुछ माह बाद वह पुन: पुराने स्वरूप में आ जाता। इसके बाद इसके चारों ओर विशाल घेरा बनाया गया, ताकि उसके दर्शन को कोई न कर सके। तब से अक्षयवट कैद में था।
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