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Prayagraj Kumbh 2019 : संगम की भीगी रेत पर आस्था के असंख्य पदचिह्न

Sun, 06 Jan 2019 06:43 PM IST
Ayush Jha सुनील मिश्र
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Prayagraj Kumbh 2019
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प्रयाग में दीर्घकालिक कल्पवास की परंपरा है। हमारे शास्त्रों में त्रिवेणी संगम को पृथ्वी का केंद्र माना गया है। प्रयागराज को तीर्थों का तीर्थ कहा गया है, जहां देश भर से लोग पूर्वजों के बिछोह के दुख और व्यथा से भरे आते हैं और उनके दिव्यांशों को पवित्र संगम में प्रवाहित करके देह और मन से शांति का अनुभव करते हैं।
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प्रयागराज में एक पूरा वातावरण है जो देश भर को, दुनिया तक को अपने यहां निमंत्रित कर रहा है। प्रकृति और समय ने जिस शीत ऋतु में इस पर्व को चुना है, उसमें कुंभ का अनुभव अनोखा ही होगा। स्वाभाविक रूप से यह उत्तर प्रदेश राज्य में हो रहा है, जहां कल का इलाहाबाद जिसका नाम आज प्रयागराज हो गया है, अवस्थित है। अनेकानेक साल इलाहाबाद अपने नाम से कुंभ का आतिथेय रहा है, इस बार उसका नाम प्रयागराज हो गया है, प्रयागराज आतिथेय है। शेष सकल संसार अतिथि है। लोग महीनों से इसकी तैयारी कर रहे होंगे। अपने घर-परिवार में अनुकूल परिस्थितियों के लिए प्रयत्न कर रहे होंगे। प्रत्येक श्रद्धालु अपनी-अपनी क्षमतानुसार एक निश्चित समय पर घर से चल पड़ेगा। 

Kumbh 2019
पुण्य का प्रथम स्पर्श
मौसम के अनेक अनुभवों से गुजरते हुए, यात्रा के अनेक पड़ावों को सहते हुए, चलते हुए, ठहरते हुए, सुस्ताते हुए जिस दिन उसका पैर प्रयागराज की धरती पर पड़ेगा, उसके लिए सुखद अवसर होगा। जिस क्षण वह चलते हुए पुण्य सलिला गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम को पहली बार निहारेगा, उसका हृदय भावनाओं का समुद्र होकर हलचल मचाने लगेगा। यह संवेदनशील सुख, यह खुशी, यह क्षण और इस क्षण का आवेग निश्चित ही अनूठा होगा, अलौकिक होगा और श्रद्धालुओं की भाषा में कहें तो पुण्य के प्रथम हार्दिक स्पर्श की तरह होगा। 

Prayagraj Kumbh 2019
पाप से मुक्त होने की चाह
भारतीय परंपरा का यह विलक्षण पक्ष ही कहा जाएगा, जब मनुष्य अपने भीतर झांकने का कौतुहलपूर्ण उपक्रम करता है। उसके जीवन को अनेकानेक बाहरी आवेग अतिक्रमित किया करते हैं। उसके जीवन में क्षण भर ठहरने का अवकाश नहीं है। वह नाहक और निरर्थक रूप से भटकाव का शिकार है। जीवन का एक बड़ा हिस्सा एक अजीब तरह के मोह से वशीभूत हुआ रहता है। मनुष्य की अधीरता, उसकी व्यग्रता और संचय की वृत्ति ने उसको अशांत बना रखा है। जीवन भर वह इसी काम में लगा रहता है। इतना ही नहीं, उसके आसपास जो घटित हो रहा है, उससे भी वह निरपेक्ष है। यह सहसा नहीं है बल्कि जाने-पहचाने, अवगत और अनुभव करते हुए हो रहा है। यही मनुष्य जितना देह से अस्वस्थ है, उतना ही मन से भी। कुंभ जैसे अवसर उसको उसके इसी भटकाव से कई बार सचेत करते हैं। जीवन को निरर्थकता के बोझ से भर लेने वाले मनुष्य की सुप्तावस्था में ऐसे क्षण उसके मुख पर पानी के छींटे की तरह होते हैं, जब वह क्षण भर को चौंककर जागता है। वह पवित्र नदी में नहाकर सब तरह के पापों से मुक्त हो जाना चाहता है, जैसे वह सब तरह के पाप और कष्ट निवारण की अचूक दवा हो।
 

Kumbh Snan
पवित्र नदी में पुण्य की डुबकी 
भारतीय परंपरा में नदी को मां कहा गया है। इस बात की सावधानी रखी जाती है कि हमारे पैर का स्पर्श नदी को न हो। हम नदी में ही पैर से सिर और शिखा तक डूबकर बैठ जाना चाहते हैं, ताकि मातृरूपी नदी हमारे सारे कुटेव धो दे, सारे पाप हर ले और हमें एक बार फिर पवित्र करके दुनिया में भेज दे, उसी तरह का जीवन जीने के लिए, जिसको जीते हुए किंचित प्रायश्चित करते हुए हम नदी में स्नान करने आ गए हैं। महाकुंभ देश के चार स्थानों का महान पर्व है, जिसके अलग-अलग क्षण और अवसर हैं। महाराष्ट्र के नासिक, मध्य प्रदेश के उज्जैन, उत्तर प्रदेश के प्रयागराज और उत्तराखंड के हरिद्वार अंचल में 12-12 सालों में यह आयोजित होता है। पिछला महाकुंभ वर्ष 2016 में महाकाल की नगरी उज्जैन में हुआ था। भारतीय परंपरा में अर्धकुंभ का अस्तित्व भी निरंतर रहा है। कालांतर में कुंभ को महाकुंभ और अर्धकुंभ को कुंभ कहा जाने लगा है। इस प्रकार प्रयागराज में यह कुंभ मकर संक्रांति के साथ ही आरंभ होने वाले अनुष्ठान के रूप में देश-विदेश के आकर्षण का केंद्र बनेगा। कहा जाता है कि प्रयागराज का कुंभ अपनी कुछ विशिष्टताओं के साथ ही देश के दूसरे स्थानों पर होने वाले कुंभ से पृथक महत्व रखता है। 

कुंभ मेला 2019
प्रयाग कुंभ की पावन परंपरा
प्रयाग में दीर्घकालिक कल्पवास की परंपरा है। हमारे शास्त्रों में त्रिवेणी संगम को पृथ्वी का केंद्र माना गया है। प्रयागराज को तीर्थों का तीर्थ कहा गया है, जहां देश भर से लोग पूर्वजों के बिछोह के दुख और व्यथा से भरे आते हैं और उनके दिव्यांशों को पवित्र संगम में प्रवाहित करके देह और मन से शांति का अनुभव करते हैं। यह उपक्रम सैकड़ों परिवारों के बुजुर्गों और पूर्वजों की अंतिम इच्छा या आकांक्षा के रूप में अपना महत्व रखता है। युधिष्ठिर को संबोधित ऋषि मार्कण्डेय का यह कथन अनेक जगह उल्लेख में आता है कि प्रयागराज समस्त देवताओं द्वारा विशेष रक्षित स्थल है। यहां एक मास तक प्रवास करने, पूर्ण परहेज रखने, अखंड ब्रह्मचर्य धारण करने और अपने देवताओं और पितरों का तर्पण करने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यहां स्नान करने वाला व्यक्ति अपनी दस पीढ़ियों को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति दिलाने में सफल होता है। संगम, ज्ञान, वैराग्य और रीतियों का मिलन स्थल है। प्रयागराज का इसी कारण बड़ा महत्व है। 

Prayagraj Kumbh 2019
महाकुंभ और मोक्ष का मर्म
महाकुंभ और कुंभ के साथ समुद्र मंथन की पौराणिक कथा का अपना अलौकिक और अनुभूत संसार है, जिसमें गहनता के साथ प्रवेश करके हम उस कथा के पूर्ण घटनाक्रम को एक प्रकार से अपने सामने पुनर्घटित होते देखते हैं और जीवन में अपने लिए अनुभव प्राप्त करते हैं। देव और असुर संग्राम के बीच अमरत्व की कामना से किया गया समुद्र मंथन आखिर है क्या। इसको लेकर ज्ञानियों ने अनेक भाष्य किए हैं। एक-एक दृश्य, एक-एक क्षण जैसे कालसापेक्ष अपनी महत्ता का बखान करता हुआ प्रतीत होता है। भारतीय ज्ञान परंपरा ने मनुष्य को पुराकथाओं के साथ ही उनके निहितार्थ और दार्शनिक भाष्य करते हुए सद्मार्ग और कल्याण के रास्ते पर चलने के लिए अनेक प्रेरणाएं प्रदान की हैं। हमारी स्थिति यही है कि हमने केवल उनके स्थूल अर्थ ग्रहण किए और भीतर के मर्म को नहीं जाना।
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कुंभ मेला 2019
मानव कल्याण की कामना का महापर्व
समुद्र मंथन को लेकर बहुत गहरे अर्थों में समझाते हुए ऋषि, मुनियों और सच्चे संतों ने इसका भाष्य मानव कल्याण के लिए किया कि यह वस्तुतः हमारी ही देह में अनवरत घटित होने वाला वह उद्वेग है, जिससे मुक्ति पाने की प्रेरणा कुंभ और महाकुंभ जैसे पर्व और अवसर दिया करते हैं। मंदराचल पर्वत, जिसे स्वयं कच्छप ने अपनी पीठ पर धारण किया, वह सर्प रूपी कामनाओं के साथ हमारे भीतर ही निरंतर चला करता है। मोहमाया और बाहृय अराजकताओं में हम इस तरह लिप्त हैं या खोए रहते हैं कि हमको उसका भान तक नहीं है। हमारे भीतर चल रहे इस उद्वेलन के बीच भी उन सब रत्नों का प्रादुर्भाव होता है जिसे हम नजरअंदाज करते रहते हैं। हमारी दृष्टि, हमारी सोच और हमारी सीमा धन, वैभव, लक्ष्मी की कामना पर जाकर स्वयं अपनी क्षमताओं को समाप्त कर लिया करती है। ज्ञान रूपी अमृत तक मनुष्य की पहुंच ही नहीं है, वह पहुंच नहीं पा रहा है या पहुंचना नहीं चाहता है। मनुष्य की यही अक्षमता उसे अनेकानेक दैहिक और मानसिक रुग्णता के द्वार पर खड़े किए हुए है। यदि ज्ञान रूपी अमृत की बहुमूल्यता को लेकर हमारी थोड़ी भी समझ है, तो हमारे मन से कितने ही तरह के वे उद्वेग हट जाएंगे, जो हमें रुग्ण या विकारयुक्त बनाए रखते हैं। 
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