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Somnath Jyotirlinga : शिव का सबसे पहला ज्योतिर्लिंग है सोमनाथ, जानें कब और क्यों बदल जाएगा इसका नाम

Fri, 26 Jul 2019 08:49 AM IST
Madhukar Mishra अनीता जैन, वास्तुविद्
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सोमनाथ मंदिर - फोटो : Rohit Jha
पूरे भारत देश में भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग स्थित हैं। इनमें सबसे पहला ज्योतिर्लिंग गुजरात राज्य के सौराष्ट्र नगर में अरब सागर के तट पर स्थित है। यह ज्योतिर्लिंग 'सोमनाथ' के नाम से जाना जाता है। इस ज्योतिर्लिंग के बारे में कहा जाता है कि यह हर सृष्टि में यहां स्थित रहा है।पहले यह क्षेत्र प्रभास क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। यहीं भगवान श्री कृष्ण ने ज़रा नामक व्याघ्र के बाण को निमित्त बनाकर अपनी लीला का संवरण किया था। सोमनाथ मंदिर की दीवारों पर अंकित मूर्तियां मंदिर की भव्यता को दर्शाती हैं।

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सोमनाथ मंदिर
तब बदल जाएगा नाम

स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का नाम हर सृष्टि के साथ बदल जाता है। इस क्रम में जब वर्त्तमान सृष्टि का अंत हो जाएगा और ब्रह्माजी नई सृष्टि रचेंगे तब सोमनाथ का नाम प्राणनाथ होगा। ऐतिहासिक सूत्रों के अनुसार आक्रमणकारियों ने इस मंदिर पर छह बार आक्रमण किया। इसके बाद भी इस मंदिर का वर्तमान अस्तित्व इसके पुनर्निर्माण के प्रयास और साम्प्रदायिक सदभावना का ही परिचायक है। सातवीं बार यह मंदिर कैलाश महामेरु प्रसाद शैली में बनाया गया है।

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सोमनाथ मंदिर
अनूठी है मंदिर की निर्माण शैली

यह मंदिर गर्भगृह, सभामंडप और नृत्य मंडप - तीन प्रमुख भागों में विभाजित है। इसका 150 फ़ीट ऊंचा शिखर है, जिस पर रखे हुए कलश का भार करीब दस टन है और इसकी ध्वजा 27 फ़ीट ऊंची है। इस मंदिर का पुनर्निर्माण महारानी अहिल्या बाई ने करवाया था।

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सोमनाथ मंदिर
कब और कैसे हुआ सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य 

शिव पुराण के अनुसार दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं का विवाह चंद्रमा के साथ हुआ था, इनमें से चंद्रमा रोहिणी से विशेष अनुराग रखते थे। उनके इस कार्य से दक्ष प्रजापति की अन्य कन्याओं को बहुत कष्ट रहता था। उन्होंने अपनी यह व्यथा अपने पिता को सुनाई। दक्ष प्रजापति ने इसके लिए चंद्रदेव को बहुत प्रकार से समझाया, किन्तु रोहिणी के वशीभूत उनके हृदय पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अपनी अन्य कन्याओं के साथ विषमता का व्यवहार देखकर दक्ष ने नाराज होकर चन्द्रमा को क्षय रोग से ग्रस्त हो जाने का श्राप दे दिय। इसके प्रभाव से चंद्रदेव तत्काल क्षयग्रस्त हो गए। उनके क्षयग्रस्त हो जाने से चन्द्रमा की शीतल किरणों के अभाव में सारा संसार निष्प्राण सा हो गया। दु:खी चन्द्रमा ने ब्रह्मा जी के कहने पर भगवान् आशुतोष की आराधना की।


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सोमनाथ मंदिर - फोटो : aa
शिवलिंग की पूजा से दूर हुआ था चंद्रदेव का रोग 

चन्द्रमा ने छः महीने तक स्थिर चित्त से खड़े रहकर भगवान शिव के मृत्युंजय स्वरुप का ध्यान करते हुए दस करोड़ मृत्युंजय मन्त्र का जप किया। तब भगवान ने प्रसन्न होकर दर्शन दिए और चन्द्रमा को अमृत्व प्रदान करते हुए मास-मास में पूर्ण एवं क्षीण होने का वर दिया। इस प्रकार भगवान आशुतोष सदाशिव की कृपा से चन्द्रमा रोगमुक्त हो गए और दक्ष के वचन की भी रक्षा हो गई। तदन्तर चन्द्रमा एवं अन्य देवताओं के प्रार्थना करने पर भगवान शंकर उन्ही के नाम से ज्योतिर्लिंग के रूप में पार्वती सहित वहां स्थित हो गए और सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से तीनों लोकों में विख्यात हुए।

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सोमनाथ मंदिर
स्मरण मात्र से नष्ट हो जाते है पाप

शिवपुराण तथा स्कन्दादि पुराणों में कहा गया है कि सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के स्मरण मात्र से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। साधक शुद्ध निर्मल अन्तःकरण वाला हो जाता है। बाबा सोमनाथ का पूजन-ध्यान करने से भोलेनाथ अपने भक्त के क्षय तथा कुष्ठ आदि रोगों का नाश कर देते हैं। मनुष्य जिस कामना के साथ इस तीर्थ का पूजन -दर्शन करता है, भोलेनाथ उसकी मनोकामना अवश्य पूरी करते हैं। वह शिव-पार्वती की अक्षय कृपा का पात्र बन जाता है। मोक्ष का मार्ग उस शिव भक्त के लिए सुलभ हो जाता है। 

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