नाम बदला। दीवारों के रंग बदले। सड़कों की शान बदली। चौराहों की पहचान बदली। और अब प्रयागराज का दिल भी बदल रहा है...
दीवारें बोल रही हैं। कहीं शहनाई के शहंशाह बिस्मिल्ला खान शहनाई बजाते दिख रहे हैं, तो कहीं घर के दरवाजे के सामने गृहणी गाय को रोटी दे रही है। कहीं समुद्र मंथन हो रहा है, तो कहीं चाय की दुकान पर दूध उफन रहा है। कहीं किसी सरकारी इमारत की दीवार पर शिव के वाहन नंदी सजे हुए हैं, तो कहीं कोई साधु अपने ध्यान में मग्न है। यह रंगों का खेल है, जो दीवारों पर खिलकर पुराने इलाहाबाद को एक नया शहर बना रहा है- प्रयागराज। पुराने लोग कहते हैं, "यह शहर ऐसा पहले कभी नहीं सजा।" प्रयागराज कुंभ के स्वागत में सजकर तैयार है।
प्रयाग कुंभ
- फोटो : अमर उजाला
सज गया शहर, संवर गई दीवारें
परंपराओं और संस्कृति की खुशबू को समेटे शहर की दीवारों पर बनी अनगिनत कलाकृतियां एक नई कहानी कह रही हैं। दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, ओडिशा के अलावा प्रयागराज और बनारस के ढेर सारे कलाकारों ने मिलकर भारतीय संस्कृति पर जो रंग बिखेरा है, वह कुंभ में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक नया और दिलचस्प अनुभव होगा। दीवारों पर विज्ञापन न चिपकाने या गंदगी न फैलाने की चेतावनियों को देख-देखकर बड़ी हुई आंखों के लिए यह सुकून की बात है। प्रयागराज में रहने वाले और फोटोग्राफी के दीवाने सुमित दि्ववेदी बताते हैं, "दीवारें तो सजी ही हैं। सेल्फी प्वॉइंट भी बनाए गए हैं। इस कुंभ में सेल्फी की धूम रहेगी।" दीवारों पर बने इन चित्रों में इतिहास है। परंपरा है। संस्कृति है। आस्था है। गंगा की महिमा है, तो आने वाले कल को संवारने की चिंता भी।
Kumbh cultural Message
नाम ही नहीं सूरत भी बदली
'पेंट माई सिटी' अभियान ने रंग जमाया है। शहर का नाम बदला था तो कुछ लोगों को पसंद नहीं आया। प्रयागराज के सुधीर शुक्ला कहते हैं, "मुख्य मार्ग से लेकर लिंक मार्ग और मोहल्लों से लेकर चौराहे तक जाने वाली हर सड़क पर जितनी भी दीवारें हैं, उन पर सांस्कृतिक गाथाओं के किरदारों और देवी-देवताओं के अलावा प्रयागराज की बड़ी हस्तियों के चित्र भी बनाए गए हैं। इससे शहर का महत्व तो बढ़ा है। तस्वीर ऐसे ही बदलती है। तस्वीर ऐसे ही बदलनी चाहिए।"
प्रयाग कुंभ
- फोटो : अमर उजाला
दीवारें करेंगी संस्कृति का गुणगान
शहर के जितने भी रास्ते से अब पर्यटक गुजरेंगे, वहां की हर दीवार पर भारत की सभ्यता की झलकियां आंखों के सामने नजर आएंगी। प्रयागराज में कुंभ के इस मौके पर लगभग पांच लाख स्क्वायर फीट पर पेंटिंग का काम हुआ है। जेल की दीवार पर 54 हजार स्क्वायर फीट के दायरे में समुद्र मंथन की कृतियां उकेरी जा रही हैं। इसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्डस में भी दर्ज कराने की तैयारी है। कई कंपनियों को शहर सजाने का काम दिया गया है। कई करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। पेंट के अलावा जगह-जगह पर मूर्तियां भी लगाई गई हैं।
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यह बदलाव भी जरूरी है
दीवारें बदलीं तो क्या शहर का मन भी बदला है। क्योंकि प्रयागराज का सांस्कृतिक महत्व भले ही हमारे दिल में हो, लेकिन गंदगी के मामले में इस शहर की अब तक आलोचना ही होती रही है। "शायद लोगों का मन बदले।" प्रयागराज के प्रसिद्ध कलाकार और प्राध्यापक डॉ. अजय जेटली एक उदाहरण देकर समझाते हैं, "विश्वविद्यालय में कला संकाय से जुड़ी एक दीवार पोस्टरों से अटी रहती थी। बेहद गंदी। हम लोगों ने उस लंबी दीवार पर म्यूरल बना दिया। अब उस पर एक भी पोस्टर नहीं लगे हैं।" डॉ. जेटली इस शुरुआत को सकारात्मक रूप में देखते हैं। लेकिन, उनका मानना है कि कहां क्या पेंट होना था, इस निर्णय में हड़बड़ी दिखती है।
Kumbh 2019
लाख टके का सवाल
"वैसे एक किस्म की हड़बड़ी प्रयागराज के स्वभाव में है।" संस्कृतिकर्मी और प्राध्यापक धनंजय चोपड़ा की बातों का मर्म वे समझ सकते हैं, जो कुंभ में न सही, कभी प्रयागराज गए हों। लोग आते रहते हैं। जाते रहते हैं। गंगा जल की कुछ बूंदें मिल जाएं, फिर कौन ठहरता है। एक बूंद में पूरी संस्कृति समा जाती है। सब हड़बड़ी में होते हैं। चोपड़ा कहते हैं, "दीवारों में तो जान आ गई है। जो सजा है, वह बचा रह जाए बस।"