ईश्वर की ओर से पहला संदेश जो हज़रत मुहम्मद को प्राप्त हुआ, वह यह था— “पढ़ अपने पालनहार के नाम से, जिसने पैदा किया। पैदा किया मनुष्य को जमे हुए ख़ून से। पढ़ कि तुम्हारा ईश्वर कृपालु है, जिसने ज्ञान सिखाया क़लम से।”
ज्ञान प्राप्त करना प्रत्येक पुरुष और स्त्री के लिए अत्यंत आवश्यक है। ईश्वर की पहचान ज्ञान के बिना नहीं हो सकती, इसलिए ज्ञान प्राप्त करने को इस्लाम धर्म में अनिवार्य करार दिया गया है। ज्ञान न केवल आदमी के विवेक को बढ़ाता है, बल्कि इसके द्वारा वह इस योग्य हो जाता है कि वह गहरी-से-गहरी हक़ीक़तों को समझ सके और वह दूसरों के अनुभवों से लाभ उठाकर अपना बौद्धिक विकास कर सके।
ज्ञान-प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि आदमी जब किसी से मिले तो खुले दिमाग़ से मिले। वह उसको सिखाने से ज़्यादा उससे सीखने का प्रयास करे। सीखने की इस प्रक्रिया को लाभदायक रूप से जारी रखने के लिए आवश्यक है कि आदमी पक्षपाती सोच से पवित्र हो, वह प्रशंसा की भावना में न जीता हो।
ज्ञान का भंडार इतना अधिक विस्तृत है कि इसे चाहे कितना ही अधिक इस्तेमाल किया जाए, इसमें किसी तरह की कोई कमी नहीं आती। ज्ञान एक ऐसा अथाह सागर है, जो हर चाहने वाले की प्यास बुझाता है; मगर इसका अपना भंडार इसके बाद भी वैसा-का-वैसा ही बना रहता है, जैसा कि वह इससे पहले था।
हज़रत मुहम्मद ने कहा है कि
“ज्ञान प्राप्त करो, चाहे इसके लिए चीन ही क्यों न जाना पड़े।” इस तरह पता चलता है कि ज्ञान-प्राप्ति में किसी भी प्रकार के पक्षपात या किसी भी प्रकार के कारण को बाधा नहीं बनाना चाहिए। प्राचीनकाल में चीन की यात्रा एक कठिन यात्रा समझी जाती थी, इसलिए यह कहना कि ज्ञान प्राप्त करो, चाहे इसके लिए चीन ही क्यों न जाना पड़े, यह अर्थ रखता है कि हर कठिनाई को सहन करके मनुष्य को ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।
उपरोक्त कथन से पता चलता है कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए यात्रा करना अत्यंत आवश्यक है। यात्रा के बिना ज्ञान में कोई बड़ी वृद्धि नहीं हो सकती। यात्रा व्यक्ति के बौद्धिक क्षितिज को बढ़ाती है और यही नहीं, यह व्यक्ति को स्थानीय ज्ञान से उठाकर विश्वव्यापी ज्ञान तक पहुँचा देती है।
ज्ञान-प्राप्ति के लिए आदमी की पहली पाठशाला उसका अपना घर है। इस पाठशाला के गुरु स्वयं माता-पिता होते हैं। इसके लिए माता-पिता का शिक्षित होना अनिवार्य है, क्योंकि अगर माता-पिता शिक्षित न हों तो वे न तो शिक्षा की महत्ता को समझने में सक्षम होंगे और न ही अपनी संतान को शिक्षित करने में उचित रूप से अपना योगदान दे सकेंगे।
हज़रत मुहम्मद के अनुसार,
“शहीद के ख़ून की तुलना में ज्ञानी की क़लम की रोशनाई अधिक श्रेष्ठ है।”
इस कथन से यह मालूम होता है कि ज्ञान की महत्ता अन्य चीज़ों से बहुत अधिक है। इसका कारण यह है कि ज्ञान का संबंध बुद्धि से है। ज्ञान से बुद्धि को एक प्रकार की ख़ुराक मिलती है। ज्ञान से यह संभव होता है कि व्यक्ति बौद्धिक मामलों को अधिक उचित रूप से समझे और यथोचित अमल की योजनाबंदी करने के योग्य हो जाए।
ज्ञान किसी सामयिक लाभ या किसी सामयिक जॉब के लिए नहीं होता, बल्कि यह एक स्थायी प्रक्रिया है, जो मनुष्य के जन्म से लेकर उसकी मृत्यु तक जारी रहती है। अत: ज्ञान अपने आपमें वांछनीय है। ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करना है और उसके विवेक को जाग्रत करना है, ताकि कोई भी व्यक्ति दो चीज़ों के बीच मौजूद अंतर को समझ सके और वह कभी सीमित सोच में ग्रस्त न हो।
हज़रत मुहम्मद की एक प्रार्थना यह थी —
“ऐ ईश्वर! मुझको ऐसे ज्ञान से बचा, जिससे कोई फ़ायदा न हो” यानी वही ज्ञान, ज्ञान है जो मानवता के लिए लाभकारी हो। ऐसे ज्ञान की प्राप्ति में अपना समय लगाना, जिसमें कोई वास्तविक लाभ न हो, समय को नष्ट करना है।”
कुरआन में सच्चे मनुष्य की मिसाल पौधे से दी गई है। जिस तरह पौधा पेड़ बनता है, उसी प्रकार मनुष्य का व्यक्तित्व भी बढ़ता रहता है। यहां तक कि हरे-भरे पेड़ की तरह वह एक प्रगतिशील व्यक्तित्व बन जाता है। मनुष्य छोटे बच्चे के रूप में जन्म लेता है, इसके बाद बढ़ते-बढ़ते पूरा आदमी बन जाता है। ठीक इसी तरह इंसान का दिमाग़ भी प्रगति करता है। यह प्रगति वैचारिक प्रक्रिया के द्वारा जारी होती है। अगर यह वैचारिक प्रक्रिया स्वस्थ शैली में जारी रहे तो मनुष्य का मस्तिष्क भी इसी तरह प्रगति की श्रेणी में पहुँच जाए, जिस प्रकार इसका शरीर प्रगति की श्रेणी तक पहुँचता है।