शास्त्रों में काम, क्रोध और लोभ इन्हें सभी पापों का मूल कारण माना गया है। इनमें सबसे प्रमुख पाप काम है। काम पीड़ित होने पर व्यक्ति के अंदर अच्छे बुरे का फर्क करने की क्षमता खत्म हो जाती है। लेकिन मनुष्य का मन हमेशा संयम में रहे ऐसा नहीं है। कभी न कभी मनुष्य काम भावना से ग्रसित जरुर होता है। इससे अनजाने में कई बार पाप हो जाता है।
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ऐसे ही पापों से मुक्ति के लिए शास्त्रों में चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी व्रत का विधान बनाया गया है। इस एकादशी को कामदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह व्रत इस वर्ष 11 अप्रैल को है। मनुष्य को चाहिए कि इस व्रत में मन को संयमित रखकर भगवान विष्णु की पूजा करें। और दैनिक कार्य करते हुए सदा मन में भगवान को याद करता रहे।
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द्वादशी के दिन किसी ब्राह्मण को भोजन और दक्षिणा देकर विदा करने के बाद ही व्रती को स्वयं भोजन करना चाहिए। इस प्रकार व्रत और दान करने से काम पीड़ित होकर किए गए पापों से मुक्ति मिलती है।
कामदा एकादशी व्रत कथा
प्राचीन काल में भोगीपुर नगर में पुण्डरीक नामक नाग राज करता था। इनके दरबार में गायन और वादन में निपुण किन्नर व गंधर्व रहा करते थे। एक दिन ललित नाम का गन्धर्व दरबार में गायन कर रहा था। अचानक उसे अपनी पत्नी की याद आ गई। इससे उसका स्वर, लय एवं ताल बिगड़ गया। इससे नाराज होकर पुण्डरीक ने ललित को राक्षस बन जाने का शाप दे दिया।
ललित के राक्षस बन जाने पर उसकी पत्नी ललिता दुःखी रहने लगी। एक दिन वन में ललिता को ऋष्यमूक ऋषि मिले। इन्होंने ललिता के दुःख को जानकर चैत्र शुक्ल एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। ललिता ने ऋषि के बताए नियम के अनुसार व्रत पूरा किया। इसके बाद व्रत का फल अपने पति ललित को दे दिया। इससे ललित वापस राक्षस से गंधर्व रुप में लौट आया। इस व्रत के पुण्य से ललित और ललिता दोनों को उत्तम लोक में भी स्थान प्राप्त हुआ।