भारतीय संस्कृति लाखों वर्षों की निरंतरता का अप्रतिम उदाहरण है। सनातन संस्कृति ने जिस धर्म ध्वजा को अनेकानेक संकटों का सामना करते हुए भी सदैव ऊंचा रखा है उसमें कुंभ की परंपरा का विशिष्ट योगदान है। अखंड भारत में विस्तृत तीर्थ, पुरियों, ज्योतिर्लिंगों और शक्तिपीठों के साथ सनातन संस्कृति के महान आर्ष ऋषियों-मनीषियों ने कुंभ के ज्योतिषीय विधान की समाज में स्थापना की और देश की एकता-अखंडता, सौहार्द-समृद्धि, राष्ट्र की सुरक्षा और धर्म की स्थापना में अद्भुत योगदान दिया है। संभवतः कुंभ भारतीय संस्कृति का सबसे विस्तृत और प्रकट प्रारुप है। संपूर्ण पृथ्वी पर किसी एक विचार को लेकर इतनी विशाल संख्या में मानव समाज किसी और अवसर पर एकत्र नहीं होता है। यह जुटान पूरी दुनिया के लिए किसी अचरज से कम नहीं।
ज्योतिष में कुंभ का महत्व
- ऐसे ही एक कुंभ में एक विदेशी पत्रकार ने जानना चाहा कि आखिर इतने लोगों को एक स्थान पर निमंत्रण देकर कैसे बुलाया जाता है। इसका उत्तर सुनकर पत्रकार महोदय अचरज में आ गए। ज्योतिष के जानकार एक विद्वान ने उन्हें बताया कि हमारे यहां कुछ पैसे का एक पतरा-पंचांग होता है जिसमें कुंभ की तिथि पहले ही लिख दी जाती है। सब उसी पंचांग को देखकर स्वंय ही नियत समय पर उल्लिखित स्थान पर आ जाते हैं।
- यहां पंचांग और ज्योतिष का उल्लेख आया है तो यह जानना रोचक है कि शास्त्रों के अनुसार जब सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति एक ही राशि में आते हैं तो ज्योतिष में उसे कुंभ योग कहते हैं। इस अनुसार राशियां 12 हैं, सूर्य का भी 12 स्वरूप माना जाता है और महीने 12 हैं। इस हिसाब से सूर्य, चंद्रमा और वृहस्पति 12 वर्षों में 12 बार ऐसा योग बनाते हैं।