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Jaya Ekadashi Vrat Katha: इस पावन कथा के बिना अधूरी है पूजा,व्रत की सफलता के लिए जरूर करें पाठ

Thu, 29 Jan 2026 10:09 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

Jaya Ekadashi Vrat Katha: जया एकादशी पर व्रत रखने के साथ भगवान विष्णु की पूजा और व्रत कथा का पाठ करने से पापों से मुक्ति मिलती है और पुण्य की प्राप्ति होती है। शास्त्रों के अनुसार कथा के बिना यह व्रत पूर्ण नहीं माना जाता, इसलिए इस दिन श्रद्धा के साथ कथा पढ़ना या सुनना भक्त के लिए अत्यंत आवश्यक होता है।
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Jaya Ekadashi Vrat Katha - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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Jaya Ekadashi 2026: आज जया एकादशी का पावन व्रत श्रद्धा और भक्ति के साथ रखा जा रहा है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाने वाली यह तिथि भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जया एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को बड़े से बड़े पापों से भी मुक्ति मिलती है और जीवन में सकारात्मकता व शुभ फल प्राप्त होते हैं। शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि इस व्रत के प्रभाव से प्रेत या पिशाच जैसी योनि में जन्म का भय समाप्त हो जाता है।

जया एकादशी के दिन व्रत, पूजा और कथा का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि केवल व्रत या पूजा करना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि कथा के बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है। इसलिए इस शुभ दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करने के साथ-साथ जया एकादशी व्रत कथा का पाठ या श्रवण अवश्य करना चाहिए, ताकि व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो और श्रीहरि की विशेष कृपा बनी रहे।

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जया एकादशी व्रत कथा 

जया एकादशी की कथा का उल्लेख भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में मिलता है। अर्जुन जब माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के महत्व के बारे में पूछते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि इस पावन तिथि को जया एकादशी कहा जाता है। वे समझाते हैं कि यह एकादशी पापों का नाश करने वाली है और इसके व्रत के प्रभाव से व्यक्ति को भयावह और कष्टदायक योनियों से मुक्ति प्राप्त होती है।

भगवान श्रीकृष्ण कथा के माध्यम से बताते हैं कि एक समय स्वर्गलोक में देवराज इंद्र का राज्य था। नंदन वन में एक भव्य उत्सव आयोजित हुआ, जिसमें देवता, ऋषि-मुनि, गंधर्व और अप्सराएं शामिल थीं। उसी उत्सव में गंधर्व पुष्पदंत और उसका पुत्र माल्यवान भी उपस्थित थे। माल्यवान एक सुंदर गंधर्व कन्या पुष्पवंती के प्रति आसक्त हो गया था। जब दोनों को इंद्र के सामने नृत्य और गायन प्रस्तुत करना था, तब आपसी मोह के कारण उनका ध्यान भंग हो गया और उनकी प्रस्तुति बार-बार बिगड़ने लगी।

इसे अपना अपमान समझकर देवराज इंद्र अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने दोनों को शाप दे दिया। शाप के प्रभाव से माल्यवान और पुष्पवंती को पृथ्वी पर हिमालय के घने जंगलों में पिशाच योनि में जन्म लेना पड़ा। यह जीवन उनके लिए बेहद दुखद और पीड़ादायक था। लंबे समय तक कष्ट सहने के बाद उन्हें अपने कर्मों का बोध हुआ और संयोगवश उसी समय माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि आ गई।

उस दिन दोनों ने अनजाने में ही जया एकादशी का व्रत कर लिया। उन्होंने न तो अन्न, फल या जल ग्रहण किया और न ही किसी जीव को कष्ट पहुंचाया। पूरी रात जागरण करते हुए वे भगवान विष्णु का स्मरण करते रहे। द्वादशी के दिन व्रत पूर्ण होते ही श्रीहरि की कृपा से उनकी पिशाच योनि समाप्त हो गई और उन्हें पुनः दिव्य स्वरूप प्राप्त हुआ।

इसके बाद दोनों स्वर्गलोक लौटे और देवराज इंद्र को प्रणाम कर बताया कि यह सब जया एकादशी व्रत और भगवान विष्णु की कृपा से संभव हुआ। अंत में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो भी व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ जया एकादशी का व्रत करता है तथा इसकी कथा का पाठ या श्रवण करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में शुभता प्राप्त होती है। इसी कारण जया एकादशी पर व्रत के साथ कथा का पाठ करना अत्यंत आवश्यक माना गया है।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है

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