21 फरवरी को माघ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी है। धार्मिक दृष्टि से माघ मास उत्तम मास है। इस पर एकादशी वह भी गुरूवार के दिन होना यह अतिउत्तम संयोग है। गुरूवार के दिन के स्वामी भगवान विष्णु हैं और जया एकादशी के पूज्य देवता भी विष्णु हैं। इसलिए इस वर्ष जया एकादशी का व्रत उत्यंत पुण्यदायी है।
शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति श्रद्घा पूर्वक जया एकादशी का व्रत रखता है वह ब्रह्महत्या जैसे महापाप से छूट जाता है। इस व्रत के पुण्य से व्यक्ति को पिशाच योनी से भी मुक्ति मिल जाती है। इस संदर्भ में एक कथा का उल्लेख किया गया है कि इन्द्र की सभा में एक गंधर्व गीत गा रहा था। परन्तु उसका मन अपनी प्रिया को याद कर रहा था। इस कारण से गाते समय उसकी लय बिगड गई। इस पर इन्द्र ने क्रोधित होकर गंधर्व और उसकी पत्नी को पिशाच योनी में जन्म लेने का श्राप दे दिया।
पिशाच योनी में जन्म लेकर पति पत्नी कष्ट भोग रहे थे। संयोगवश माघ शुक्ल एकादशी के दिन दुःखों से व्याकुल होकर इन दोनों ने कुछ भी नहीं खाया और रात में ठंढ की वजह से सो भी नहीं पाये। इस तरह अनजाने में इनसे जया एकादशी का व्रत हो गया। इस व्रत के प्रभाव से दोनों श्राप मुक्त हो गये और पुनः अपने वास्तविक स्वरूप में लौटकर स्वर्ग पहुंच गये। देवराज इन्द्र ने जब गंधर्व को वापस इनके वास्तविक स्वरूप में देखा तो हैरान हुए। गन्धर्व और उनकी पत्नी ने बताया कि उनसे अनजाने में ही जया एकादशी का व्रत हो गया। इस व्रत के पुण्य से ही उन्हें पिशाच योनी से मुक्ति मिली है।
शास्त्रों में बताया गया है कि इस व्रत के दिन पवित्र मन से भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। मन में द्वेष, छल-कपट, काम और वासना की भावना नहीं लानी चाहिए। नारायण स्तोत्र एवं विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए। इस प्रकार से जया एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती।