जानकी नवमी को वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व माता सीता के जन्म की स्मृति में मनाया जाता है, जो त्रेतायुग की एक पवित्र, संयमशील और त्यागमयी स्त्रीत्व की प्रतीक मानी जाती हैं। यह पर्व विशेष रूप से मिथिला, उत्तर प्रदेश, बिहार और नेपाल के क्षेत्रों में श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है।
सीता नवमी पर पूजा का शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, 5 मई, सोमवार को वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि सुबह 7 बजकर 36 मिनट से शुरू हो रही है। ऐसे में इसी समय से माता सीता की पूजा की जा सकती है। लेकिन नवमी तिथि को मध्याह्न के समय देवी सीता का जन्म हुआ था। ऐसे में इस दिन अभिजीत मुहूर्त के समय पूजा करना अत्यंत शुभ रहेगा। यह मुहूर्त सुबह 11 बजकर 51 मिनट से दोपहर के 12 बजकर 45 मिनट तक रहेगा।
माता सीता का जन्म
पौराणिक मान्यता के अनुसार, मिथिला नरेश राजा जनक एक दिन खेत में हल चला रहे थे। तभी उन्हें भूमि के गर्भ से एक कन्या प्राप्त हुई। वह कन्या कोई साधारण बालिका नहीं थीं, बल्कि भूमिपुत्री थीं — धरती माता की संतान। राजा जनक ने उस कन्या को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया और उसका नाम रखा सीता। चूंकि वे हल की नोंक (सीता) से प्राप्त हुई थीं, इसीलिए उन्हें 'सीता' कहा गया। वहीं मिथिला की राजकुमारी होने के कारण उन्हें 'जानकी' भी कहा गया, और राजा जनक की पुत्री होने के नाते 'जनकनंदिनी' भी।
धार्मिक महत्व
माता सीता को भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम की अर्धांगिनी के रूप में जाना जाता है। उनका जीवन आदर्श नारीत्व, पतिव्रता धर्म, सहनशीलता और आत्मबलिदान का प्रतीक है। जानकी नवमी के दिन माता सीता के गुणों का स्मरण किया जाता है और उनका पूजन कर कन्याओं को भोजन कराकर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। यह दिन उन स्त्रियों के लिए विशेष है जो विवाह, सौभाग्य और संतान सुख की कामना रखती हैं।
जानकी नवमी की पूजा विधि
जानकी नवमी पर प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर माता सीता और भगवान श्रीराम की प्रतिमा को स्थापित किया जाता है। फिर फूल, अक्षत, चंदन, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित कर व्रत कथा सुनी जाती है। कई श्रद्धालु इस दिन रामचरितमानस, सुंदरकांड या सीता चरित्र का पाठ भी करते हैं।
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पूजा का फल
धर्मशास्त्रों के अनुसार इस पावन पर्व पर जो भी भगवान राम सहित माँ जानकी का व्रत-पूजन करता है,उसे पृथ्वी दान का फल व समस्त तीर्थ भ्रमण का फल स्वतः ही प्राप्त हो जाता है एवं समस्त प्रकार के दुखों,रोगों व संतापों से मुक्ति मिलती है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने वाली सुहागिन स्त्रियों को अखंड सौभाग्य मिलता है और कुंवारी कन्याओं को अच्छे वर की प्राप्ति होती है।