हिंदू धर्म में चार धाम की यात्रा करना बहुत शुभ और पुण्यदायक माना जाता है। मान्यता है कि जो लोग चारधाम की यात्रा करते हैं उनके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है। पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भगवान को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है, आइए जानते हैं इसके पीछे की पौराणिक कथा के बारे में...
पौराणिक कथा
भगवान श्रीकृष्ण की परम उपासक कर्मा बाई जी, जगन्नाथ पुरी में रहती थी और भगवान को बचपन से ही पुत्र रूप में भजती थीं। एक दिन कर्मा बाई की इच्छा हुई कि ठाकुर जी को फल-मेवे की जगह अपने हाथ से कुछ बनाकर खिलाऊँ। उन्होंने जगन्नाथ प्रभु को अपनी इच्छा बतलायी। प्रभु जी बोले - "माँ ! जो भी बनाया हो वही खिला दो, बहुत भूख लगी है।
कर्मा बाई ने खिचड़ी बनाई थी। ठाकुर जी को खिचड़ी खाने को दे दी । प्रभु बड़े चाव से खिचड़ी खाने लगे। भगवान ने कहा - "माँ ! मुझे तो खिचड़ी बहुत अच्छी लगी। मेरे लिए आप रोज खिचड़ी ही पकाया करें। मैं तो यही आकर खाऊँगा। अब तो कर्मा बाई जी रोज सुबह उठतीं और सबसे पहले खिचड़ी बनातीं, बाकी सब कुछ बाद में करती थी। भगवान सुबह-सुबह आते, भोग लगाते और फिर चले जाते। एक बार एक महात्मा कर्मा बाई के पास आया। महात्मा ने उन्हें सुबह-सुबह खिचड़ी बनाते देखा तो नाराज होकर कहा - "माता जी, आप यह क्या कर रही हो ? सबसे पहले नहा धोकर पूजा-पाठ करनी चाहिए। कर्मा बाई बोलीं - "क्या करुँ ? महाराज जी ! संसार जिस भगवान की पूजा-अर्चना कर रहा होता है, वही सुबह-सुबह भूखे आ जाते हैं। उनके लिए ही तो सब काम छोड़कर पहले खिचड़ी बनाती हूँ ।
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महात्मा कर्मा बाई को समझाने लगे - " सुबह स्नान के बाद पहले रसोई की सफाई करो, फिर भगवान के लिए भोग बनाओ "। अगले दिन कर्मा बाई ने ऐसा ही किया। जैसे ही सुबह हुई भगवान आये और बोले - "माँ ! मैं आ गया हूँ, खिचड़ी लाओ । कर्मा बाई ने प्रभु को थोड़ा रुकने के लिए कहा। भगवान सोचने लगे कि आज माँ को क्या हो गया है ? ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ। फिर जब कर्मा बाई ने खिचड़ी परोसी तब भगवान ने झटपट करके जल्दी-जल्दी खिचड़ी खायी। फिर जल्दी-जल्दी में भगवान बिना पानी पिये ही मंदिर में भागे।
अब यहां ठाकुर जी के मन्दिर के पुजारी ने जैसे ही मंदिर के पट खोले तो देखा भगवान के मुख पर खिचड़ी लगी हुई है। पुजारी बोले - "प्रभु जी ! ये खिचड़ी आपके मुख पर कैसे लग गयी है ?" भगवान ने कहा - "पुजारी जी, मैं रोज मेरी कर्मा बाई के घर पर खिचड़ी खाकर आता हूँ। आप माँ कर्मा बाई जी के घर जाओ और जो महात्मा उनके यहाँ ठहरे हुए हैं, उनको समझाओ। उसने मेरी माँ को गलत कैसी पट्टी पढाई है ?" पुजारी ने महात्मा जी से जाकर सारी बात कही कि भगवान भाव के भूखे हैं। यह सुनकर महात्मा जी घबराए और तुरन्त कर्मा बाई के पास जाकर कहा - "माता जी ! माफ़ करो, ये नियम धर्म तो हम सन्तों के लिए हैं। आप तो जैसे पहले खिचड़ी बनाती हो, वैसे ही बनायें। आपके भाव से ही ठाकुर जी खिचड़ी खाते रहेंगे ।" फिर एक दिन आया, जब कर्मा बाई के प्राण छूट गए। उस दिन पुजारी ने मंदिर के पट खोले तो देखा - भगवान की आँखों में आँसू हैं और प्रभु रो रहे हैं। पुजारी ने रोने का कारण पूछा तो भगवान बोले - "पुजारी जी, आज मेरी मां कर्मा बाई इस लोक को छोड़कर मेरे निज लोक को विदा हो गई है। अब मुझे कौन खिचड़ी बनाकर खिलाएगा ?" पुजारी ने कहा - "प्रभु जी ! आपको मां की कमी महसूस नहीं होने देंगे। आज के बाद आपको सबसे पहले खिचड़ी का भोग ही लगेगा ।" इस तरह आज भी जगन्नाथ भगवान को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है।